क्या कोई ऐसी भाषा हो सकती है जो सब समझ पाएं? - दुनिया जहान
अंग्रेज़ी एक ग्लोबल लैंग्वेज है. कई लोग यह भाषा बोलते हैं, लेकिन सभी इस भाषा की अभिव्यक्ति को अपनी अभिव्यक्ति नहीं मानते.
क्या कोई ऐसी भाषा हो सकती है जो सब समझ पाएं? - दुनिया जहान

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8 जनवरी 2026
दुनिया भर में हज़ारों भाषाएं बोली जाती हैं. कई धार्मिक ग्रंथों और किताबों का अनुवाद अलग-अलग भाषाओं में किया गया है. और दुनिया की बड़ी आबादी इसे अपनी-अपनी भाषा में जानती और समझती है.
हाल ही में क्रिसमस पर लोगों ने एक-दूसरे को शुभकामनाएं दी.
ईसा मसीह के जन्म की कहानी सैंकड़ों सालों से हज़ारों भाषाओं में दुनिया भर में लिखी और पढ़ी जा चुकी है. अलग-अलग भाषाओं में इसका अलग स्वरूप रहा है.
मगर सभी भाषाओं में इसका संदेश एक ही रहा है - सभी लोगों का जीवन शांति और प्रेम से भरपूर हो, लोग साथ मिल कर रहें, एक दूसरे से प्रेम करें.
हालांकि, कई बार लोगों को ऐसी जगह जाने पर परेशानियों का सामना भी करना पड़ता है जहां की भाषा वह नहीं समझते हैं.
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ऐसे में लोगों के मन में यह सवाल भी आता है कि कोई एक ऐसी भाषा हो जिसे सब जानते और समझते हों…
दुनिया जहान में इस बार हम इस पर ही बात करेंगे-क्या कभी विश्व की एक वैश्विक या ग्लोबल भाषा हो पाएगी?
एस्पेरांटो का जन्म और विस्तार
19वीं सदी में जब एक किशोर पोलैंड के एक नए शहर में रहने लगा तो उसे वहां लोगों के उत्पीड़न का सामना करना पड़ा.
उसने पाया कि इसकी वजह भाषा थी. पोलैंड के उस शहर में अलग-अलग समुदाय के लोग अलग-अलग भाषाएं बोलते थे.

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इमेज कैप्शन, पूर्वी पोलैंड की एस्पेरांटो लायब्रेरी के लुडविक ज़ामनहॉफ़ सेंटर में एक वॉलंटियर कुछ पढ़ रही है
मिसाल के तौर पर वहां पोलिश, जर्मन, यिडीश और रूसी भाषा बोली जाती थी. इस किशोर का नाम था लुडविग लेत्सा ज़ामनहॉफ़. उसने सोचा कि क्यों न एक ऐसी अंतरराष्ट्रीय भाषा बनाई जाए जो भिन्न समुदायों के बीच एक पुल का काम करे, जिसे सब समझ सकें.
उसने 1887 में ऐसी एक भाषा बनाई जिसका नाम था एस्पेरांटो.
अमेरिका की प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी में इंग्लिश की प्रोफ़ेसर एस्थर शोर ने एस्पेरांटो भाषा पर एक किताब लिखी है. वह बताती हैं कि उस समय यूरोप में लोगों ने एस्पेरांटो को भविष्य की भाषा के रूप में देखना शुरू कर दिया था.
उन्होंने कहा कि ज़ामनहॉफ़ ने एक पैम्फलेट या पर्चा तैयार करके लोगों में बांटना शुरू किया.
शुरुआत में एस्पेरांटो भाषा का यह पैम्फलेट रूसी भाषा में छपा था. उसने लोगों को इस पर्चे के इस्तेमाल से एक-दूसरे को पत्र लिखने या संदेश देने के लिए प्रोत्साहित किया.
छोटे ग्रुप बनाकर लोगों को एस्पेरांटो पर चर्चा करने और एक शब्दकोष तैयार करने के लिए इकट्ठा करना शुरू किया. धीरे-धीरे यह भाषा फैलने लगी.
कुछ महीनों के भीतर ही ज़ामनहॉफ़ के इस पैम्फ़लेट का जर्मन, पोलिश और फ्रेंच भाषा में अनुवाद हो गया. एस्थर शोर कहती हैं कि इस प्रयोग को सबसे अधिक बल तब मिला जब फ़्रांस के अकादमिक जगत ने इसे गंभीरता से लेना शुरू किया.
मगर क्या यह समाज के अभिजात्य वर्ग तक ही सीमित नहीं था?
इस पर एस्थर शोर ने कहा, "फ़्रांस में ज़्यादातर अभिजात्य वर्ग के लोगों ने इसे अपनाना शुरू किया लेकिन रूस में मध्यवर्ग के कई लोगों ने इसका इस्तेमाल शुरू किया और बाद में मज़दूरों में एस्पेरांटो लोकप्रिय होने लगी. 1920 के दशक में वामपंथी गुटों में यह लोकप्रिय होने लगी."

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इमेज कैप्शन, एस्पेरांटो में वैश्विक भाषा यानी ग्लोबल लैंग्वेज बनने की संभावना थी.
कितने लोग एस्पेरांटो बोलते थे, इसका सर्वेक्षण कभी नहीं हुआ. लेकिन यूरोप के छोटे शहरों में इस नवनिर्मित भाषा का इस्तेमाल बढ़ने लगा और उसी के साथ दुनिया में इसका प्रसार शुरू हुआ.
एस्थर शोर का मानना है कि कोई भाषा केवल बच्चों द्वारा बोले जाने से विकसित नहीं होती बल्कि उसे विकसित करने के लिए कटिबद्ध लोगों के प्यार और प्रयासों की आवश्यकता होती है.
तो इस भाषा के शब्द कैसे थे? मिसाल के तौर पर एस्पेरांटो भाषा में अभिवादन के लिए क्या शब्द थे?
एस्थर बताती हैं कि एस्पेरांटो में हैलो के लिए शब्द है- सैलूटान.
बोंगवेनम यानी आपका स्वागत है. शुक्रिया या थैंक यू कहना हो तो आप कहेंगे डैंकोन. मेरी क्रिसमस कहना हो तो आप कहेंगे बोनोम क्रिसमस. अलविदा के लिए शब्द है जीस.
एस्पेरांटो में वैश्विक भाषा यानी ग्लोबल लैंग्वेज बनने की संभावना थी.
मगर पहले विश्व युद्ध की शुरुआत होते ही इस पर बड़ा आघात हुआ क्योंकि कई देशों में राष्ट्रवादी सोच बल पाने लगी जिसके चलते वहां लोगों ने एस्पेरांटो को संदेह की नज़र से देखना शुरू कर दिया. मगर युद्ध की समाप्ति के बाद एस्पेरांटो में लोगों की रुचि फिर जगी.
एस्थर शोर के अनुसार 1920 के दशक में एक क्रांतिकारी सोच पनप रही थी और लातिन अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान और चीन में लोगों ने इस भाषा को अपनाना शुरू कर दिया. वह कहती हैं कि चीन ने इस भाषा को बढ़ावा देने के लिए काफ़ी निवेश भी किया क्योंकि वह अंग्रेज़ी को उपनिवेशी ताक़त से जोड़कर देखता था और नहीं चाहता था कि अंग्रेज़ी विश्व की साझा भाषा बने.
चीन में सरकार भी अपने समाज के आधुनिकीकरण के लिए एस्पेरांटो का इस्तेमाल करना चाहती थी. मगर एस्थर शोर को नहीं लगता कि एस्पेरांटो कभी विश्व की साझा भाषा बन पाएगी.
भाषा का फैमिली ट्री
फ़िलहाल दुनिया में 7100 भाषाएं बोली जाती हैं.
मान लिया जाए कि ये सभी भाषाएं एक ही समय में अस्तित्व में आईं और विश्व की आबादी लगभग आठ अरब है तो उस हिसाब से हर भाषा को बोलने वाले गुट में लगभग दस लाख लोग बनते हैं. लेकिन वास्तव में ऐसा है नहीं.
वह एक यूट्यूब चैनल चलाते हैं जिसमें वह कई शब्दों की उत्पत्ति का विश्लेषण करते हैं और भाषाओं के विकास और प्रसार की चर्चा करते हैं.
उन्होंने बीबीसी को बताया कि भाषाओं के जन्म का अनुमान लगाना डायनासोर या किसी प्राणी के अवशेषों से उसकी उम्र का पता लगाने से बहुत मुश्किल और पेचीदा है.
माना जाता है कि बोली जाने वाली भाषा की शुरुआत एक लाख पैंतीस हज़ार साल पहले हुई मगर लिखी जाने वाली भाषा का विकास देर से हुआ. हावभाव के ज़रिए या साइन लैंग्वेज के ज़रिए संवाद का तरीका और भी पुराना है.

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इमेज कैप्शन, विशेषज्ञों का मानना है कि अधिकांश भाषाएं एक ही फैमिली ट्री का हिस्सा हैं
वैज्ञानिकों के अनुसार बोलने के लिए मनुष्य बंदरों के मुकाबले अपने शरीर का बेहतर इस्तेमाल कर सकते हैं क्योंकि वह सधी हुई लंबी सांस ले सकते हैं जो शब्दों के उच्चारण में मदद करती है.
एशिया और यूरोप में रहने वाले निएंडरथल या आदिमानवों की प्रजाति के शरीर की रचना एक जैसी थी. कई विशेषज्ञों का मानना है कि पांच से छह लाख साल पहले निएंडरथल के नज़दीकी मानव वंशज किसी प्रकार की भाषा ज़रूर बोलते होंगे.
पैट्रिक फ़ोट का कहना है, "अधिकांश भाषाएं एक ही फ़ैमिली ट्री का हिस्सा हैं. यूरोप की अधिकांश भाषाएं और दक्षिण एशिया की हिंदी, उर्दू या फ़ारसी जैसी भाषाएँ एक ही इंडो-यूरोपियन फ़ैमिली ट्री का हिस्सा हैं जिनका एक-दूसरे के साथ गहरा संबंध है."
माना जाता है कि लगभग आठ हज़ार साल पहले इंडो-यूरोपीयन भाषा बोलने वाले लोग काले सागर के उत्तर में यानी वर्तमान यूक्रेन और रूस के आसपास के निवासी थे.
बाद में ये लोग पूर्व और पश्चिम में स्थानांतरण कर गए और उनके साथ उनकी भाषा भी नए क्षेत्रों में फैलती गई. पुरातत्व विज्ञान में इसके कुछ सुराग़ ज़रूर मिलते हैं मगर यह अब भी एक पहेली है कि इतने छोटे गुट की भाषा दुनिया भर में कैसे फैल गई.
माना जाता है कि दुनिया की आधी आबादी की मातृभाषा का संबंध इंडो-यूरोपीयन भाषाओं से है.
पैट्रिक फ़ोट कहते हैं कि आज अंग्रेज़ी विश्व की लिंगुआ फ्रांका या प्रमुख भाषा है. यानी ऐसी भाषा जिसके माध्यम से कई लोग एक-दूसरे के साथ बातचीत कर पाते हैं. मगर जब रोमन साम्राज्य अपने उरूज पर था तब लैटिन लिंगुआ फ़्रांका थी और रोमन लोगों के साथ वह यूरोप और उत्तरी अफ़्रीका के कई देशों में फैली.
लेकिन आज एक और भाषा है जो दुनिया की लिंगुआ फ़्रांका बन सकती है. हर दस में से नौ लोग रोज़ इसका इस्तेमाल ऑनलाइन करते हैं.
पैट्रिक फ़ोट के अनुसार, वह है- इमोजी - यह दुनिया की साझा भाषा है.
"यह सामान्य सी इमेज है जिसे सभी समझते हैं. सभी लोग अपने विचारों और भावनाओं को व्यक्त करने के लिए इमोजी का इस्तेमाल करते हैं. एक-दूसरे को मैसेज में इमोजी भेजते हैं. इमोजी काफ़ी तेज़ी से विकसित और लोकप्रिय हो रही है."
लेकिन क्या कोई भाषा अंग्रेज़ी की जगह नई लिंगुआ फ़्रांका बन सकती है? और इसमें टेक्नोलॉजी की क्या भूमिका हो सकती है?
पैसा बोलता है
भाषा संबंधी रिसर्च के कैटलॉग एथनॉलॉग के अनुसार, अंग्रेज़ी केवल 39 करोड़ लोगों की मातृभाषा है जबकि स्पेनिश 48.4 करोड़ लोगों की मातृभाषा है. मगर दुनिया में सबसे अधिक यानी लगभग एक अरब लोगों की मातृभाषा मंदारिन है.
ऐसे में छोटी उपभाषाएं कैसे जीवित रह पाएंगी? इसका जवाब जानने के लिए हमने बात की सलीकोको मुफ़वेने से जो अमेरिका की शिकागो यूनिवर्सिटी में लिंग्विस्टिक्स के प्रोफ़ेसर हैं. वह डेमोक्रैटिक रिपब्लिक ऑफ़ कांगो के रहने वाले हैं.

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इमेज कैप्शन, अफ़्रीका में वाइट कॉलर जॉब करने वाले लोग अंग्रेज़ी बोलते हैं लेकिन उन्हें अपनी मातृभाषा भी सीखनी पड़ती है
वह कहते हैं कि अफ़्रीका में बहुत कम लोग ठीक-ठाक पैसे कमा पाते हैं.
वे व्हाइट कॉलर नौकरियां करते हैं जहां अंग्रेज़ी में काम होता है, जो कि अभिजात्य वर्ग की लिंगुआ फ़्रांका है. वह लोग अपने घर में बच्चों के साथ अंग्रेज़ी में बात करते हैं क्योंकि वे अपने बच्चों के लिए बेहतर भविष्य चाहते हैं. मगर परिवार में कई रिश्तेदार अंग्रेज़ी या फ़्रेंच नहीं बोलते, इसलिए सभी को अंग्रेज़ी के अलावा अपने देश की मातृभाषा भी सीखनी पड़ती है क्योंकि हमारे जीवन में परिवार की महत्वपूर्ण भूमिका होती है.
उनसे संपर्क बने रहना आवश्यक होता है, जिसके लिए उनसे उनकी भाषा में बात करना ज़रूरी होता है. इसी वजह से छोटी उपभाषाओं का अस्तित्व बना हुआ है.
अनुमान है कि विश्वभर में 1.5 अरब लोग अंग्रेज़ी बोल सकते हैं. सलीकोको मुफ़वेने मानते हैं कि इसकी वजह अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद की सफलता है.
वह कहते हैं कि अंग्रेज़ दुनिया के बड़े हिस्से को अपना उपनिवेश बनाने में सफल रहे और इसी के साथ ब्रिटेन के उपनिवेशों में अंग्रेज़ी बोली जाने लगी. इसके बाद अमेरिका के सैनिक महाशक्ति बनकर उभरने से भी अंग्रेज़ी के प्रसार में मदद हुई.
एथनॉलॉग के अनुसार, दुनिया की 44 प्रतिशत भाषाएं विलुप्ति की कगार पर हैं. कई ऐसी भाषाएं हैं जिन्हें बोलने वाले लोग एक हज़ार से भी कम बचे हैं. आशंका है कि अगले 75 सालों में दुनिया की कुल भाषाओं में से 50 से 90 तक भाषाएं विलुप्त हो जाएंगी.
सलीकोको मुफ़वेने इससे सहमत नहीं हैं. वह कहते हैं कि हो सकता है अंग्रेज़ी दुनिया की लिंगुआ फ़्रांका बन जाए और उसका प्रसार दुनिया के कई अन्य क्षेत्रों में हो. मगर चीन में ऐसा नहीं होगा क्योंकि चीन एक बड़ी आर्थिक ताक़त है और उसने यह मंदारिन के ज़रिए हासिल किया है.
वहीं, ग्लोबल साउथ के कई देशों में अब भी बहुत बेरोज़गारी और ग़रीबी है. वहां लोग अपनी स्थानीय भाषाओं में ही बातचीत करते हैं और यूरोपीय भाषाओं से उनका संबंध बहुत कम है.
मौन होने के विरुद्ध

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इमेज कैप्शन, विशेषज्ञों का मानना है कि इमोजी ऐसी भाषा के रूप में विकसित हो रही है जिसे सभी समझते हैं
कई समुदाय अपनी भाषा को जीवित रखने के लिए कोशिश कर रहे हैं. कई बार कुछ बाहरी भाषाएं स्थानीय लोगों पर थोप दी जाती हैं.
हमारी चौथी एक्सपर्ट सेलेस्टी रॉड्रिगेज़ लौरो अर्जेंटीना में रहती थीं और अब वह वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया यूनिवर्सिटी में लिंग्विस्टिक्स विभाग में एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं. वह कहती हैं कि अर्जेंटीना में बोली जाने वाली स्पेनिश यूरोपीय स्पेनिश से अलग है, मगर स्कूल में यूरोपीय स्पेनिश पढ़ाई जाती थी. वह कहती हैं कि भाषाएं सिर्फ़ विलुप्त ही नहीं होतीं बल्कि बदलती भी हैं.
वह यह भी कहती हैं कि जब कोई भाषा विलुप्त हो जाती है तो उसे दोबारा जीवित करना बहुत मुश्किल होता है. लेकिन अगर किसी भाषा का इस्तेमाल घटता चला जाए तो समय रहते उसे दोबारा इस्तेमाल में लाने के प्रयास किए जा सकते हैं. कई समुदाय आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस और अन्य टेक्नोलॉजी के ज़रिए अपने क्षेत्र की भाषा को दोबारा प्रचलित करने का प्रयास कर रहे हैं क्योंकि वह भाषा उनकी ज़मीन और पहचान से जुड़ी हुई है.
सेलेस्टी रॉड्रिगेज़ लौरो ने कहा कि आज लोगों के पास अपनी भाषा चुनने की क्षमता पहले से कहीं अधिक है. उनकी जो भाषा उनसे छीन ली गई, वह उसे दोबारा प्राप्त करके अपनाने की कोशिश कर रहे हैं. भाषा केवल बातचीत का माध्यम या कामकाज़ के लिए ज़रूरी साधन ही नहीं है, बल्कि हमारे इतिहास और पहचान का हिस्सा है.
मगर क्या कभी विश्व की एक वैश्विक या ग्लोबल भाषा हो पाएगी?
सेलेस्टी रॉड्रिगेज़ लौरो का कहना है, "अंग्रेज़ी तो एक ग्लोबल लैंग्वेज है ही. कई लोग यह भाषा बोलते हैं, लेकिन सभी इस भाषा की अभिव्यक्ति को अपनी अभिव्यक्ति नहीं मानते."
एस्पेरांटो को ग्लोबल लैंग्वेज या विश्व की साझा भाषा बनाने की कोशिश की गई. मगर वह सफल नहीं हो पाई.
इससे पता चलता है कि भाषा का पहचान, इतिहास और सत्ता से कितना गहरा संबंध है.

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दुनिया में लोगों का लगातार स्थानांतरण भाषाओं के नक़्शे बदल रहा है. आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस या एआई ने इसमें एक नया मोड़ ला दिया है, जिसकी वजह से हो सकता है कि शायद दुनिया को एक साझा भाषा की ज़रूरत ही न पड़े. एआई टेक्नोलॉजी तेज़ी से विकसित हो रही है और वह एक भाषा का दूसरी भाषा में तेज़ी से अनुवाद कर सकती है.
सेलेस्टी रॉड्रिगेज़ लौरो की मानें तो हो सकता है आने वाले 75 सालों में आप किसी स्पेनिश व्यक्ति से हिंदी में अपनी बात कहें और एआई उसका अनुवाद स्पेनिश भाषा में करता चले. यानी न उस व्यक्ति को हिंदी समझने की ज़रूरत होगी और न आपको स्पेनिश.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.