अनोखी तकनीक से इतिहास रचने वाले जेवियर सोटोमायोर का रिकॉर्ड आज भी क्यों नहीं टूट पाया है?
साल 1984 में हवाना में सोटोमायोर 2.33 मीटर की छलांग लगाते हुए जूनियर वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया. टॉप फॉर्म में होने के बावजूद वो 1984 और 1988 ओलंपिक खेलों में हिस्सा नहीं ले पाए, क्योंकि क्यूबा ने इन गेम्स का बायकॉट किया था.
अनोखी तकनीक से इतिहास रचने वाले जेवियर सोटोमायोर का रिकॉर्ड आज भी क्यों नहीं टूट पाया है?

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इमेज कैप्शन, अगस्त 1992 को बार्सिलोना ओलंपिक खेलों में क्यूबा के जेवियर सोटोमायोर ने हाई जंप प्रतियोगिता के दौरान
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- Author, हरप्रीत कौर लांबा
- पदनाम, खेल पत्रकार, बीबीसी हिन्दी के लिए
- 5 जनवरी 2026
क्यूबा के दिग्गज हाई जंपर जेवियर सोटोमायोर से मिलना एक अनोखा अनुभव है. 58 साल के सोटोमायोर ओलंपिक गोल्ड मेडल विजेता हैं और हाई जंप में वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर हैं.
सोटोमायोर की पहचान एक ऐसे एथलीट की रही है जिन्होंने अपनी अनोखी तकनीक से हाई जंप को नए तरीके से परिभाषित किया.
सोटोमायोर ने 14 साल की उम्र में हाई जंप शुरू किया. वह 8 फीट की छलांग लगाने वाले दुनिया के इकलौते हाई जंपर हैं.
उन्होंने साल 1989 में प्यूर्टो रिको में 2.44 मीटर और साल 1993 में स्पेन में 2.45 मीटर की छलांग लगाकर मानो ग्रेविटी को भी चुनौती दी. तीन दशक बाद आज भी उनका ये वर्ल्ड रिकॉर्ड कायम है.
सोटोमायोर से उम्मीद की जाती है कि वह अपनी ऐतिहासिक उपलब्धियों के पीछे वैज्ञानिक या तकनीकी रहस्यों पर बात करेंगे. लेकिन इसके बजाए वह अपनी 'सफलता के असामान्य दृष्टिकोण' से हैरान करते हैं.
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सोटोमायोर नहीं चाहते कि बाक़ी लोग, यहाँ तक कि उनका 17 साल का बेटा जैक्सियर भी उनकी तकनीक की नकल करे
"14 साल की उम्र में मैंने हाई जंपर बनने का फ़ैसला किया और यह तकनीक मैंने खुद खोजी. किसी ने मुझे नहीं सिखाया. मैं इस तकनीक पर कायम रहा, भले ही मेरे कोच इसे बदलना चाहते थे."
"वे कहते कि आपको इस तरह से कूदना नहीं चाहिए, लेकिन इससे मुझे नतीजे मिले और मैं इससे जुड़ा रहा. मेरे कोच को भी इस पर भरोसा हो गया."
सोटोमायोर ने ये बातें भारत में आयोजित एकमरा स्पोर्ट्स लिटरेचर फेस्टिवल के सातवें संस्करण में हिस्सा लेते वक्त कहीं.
'मैं नहीं चाहता मेरा बेटा मेरी नकल करे'

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इमेज कैप्शन, जेवियर सोटोमायोर का रिकॉर्ड तीन दशक बाद भी नहीं टूट पाया है
सोटोमायोर कहते हैं, "मैंने ज्यादा भागने पर बहुत जोर दिया ताकि टेक-ऑफ जितना संभव हो उतना बेहतर हो. मैं भागने के साथ जंप के समय बहुत फोर्स बना रहा था. मैंने अपने टखनों को मजबूत किया क्योंकि उन पर असर पड़ता था. अपने पूरे करियर के दौरान जंप से पहले मेरा आखिरी कदम बहुत लंबा होता था, जो दुनिया के बाकी खिलाड़ियों से अलग था."
वो बताते हैं, "आमतौर पर अन्य एथलीटों का आखिरी कदम छोटा होता है. लेकिन मैं इसे लंबा रखता था. मैं दो तकनीकों को जोड़ने की कोशिश कर रहा था, एक तकनीक भागने पर निर्भर थी और दूसरी ताकत पर. इसी वजह से मुझे कामयाबी मिली."


