कम लागत में अधिक मुनाफा:बाड़मेर जिले के कुंडा खान ने रेगिस्तान में मछली पालन का किया नवाचार, कम लागत में अधिक मुनाफा कमा रहे
बाड़मेर जैसे रेगिस्तानी जिले में जहां पानी की एक-एक बूंद कीमती है, वहां मछली पालन की कल्पना करना भी बेकार लगता है। लेकिन धोरीमन्ना पंचायत समिति के कोलियाना गांव के एक प्रगतिशील किसान कुंडा खान ने इस नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाया है। कृषि विज्ञान केंद्र और मत्स्य विभाग से प्रशिक्षण लेकर कुंडा खान आज न केवल लाखों का मुनाफा कमा रहे हैं, बल्कि इलाके के अन्य किसानों के लिए रोल मॉडल बन गए हैं। कुंडा खान ने 2022 में मछली पालन का व्यवसाय शुरू किया। उन्होंने 12 हजार वर्ग फीट में दो तालाब बनाकर काम शुरू किया। शुरुआत में सही बीज और तकनीक की कमी के कारण उन्हें आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा। लेकिन हार मानने के बजाय उन्होंने कृषि विज्ञान केंद्र गुड़ामालानी और मत्स्य विभाग से संपर्क किया। वैज्ञानिक तरीकों को अपनाकर उन्होंने 30 हजार पंगेशियस फिंगर लिंग्स डाले और महज 6 महीने में 20 टन मछली का उत्पादन कर 7.40 लाख रुपए का शुद्ध मुनाफा कमाया। आज कुंडा खान के पास 2.5 एकड़ क्षेत्र में 7 तालाब हैं और 10 अन्य युवाओं को रोजगार भी दे रहे हैं। कुंडा खां बताते है कि शुरूआत में काफी नुकसान हुआ था, लेकिन हार नहीं मानते हुए फिर से वैज्ञानिक तरीके से मछली पालन किया तो सफलता मिली। दिल्ली व पंजाब में सबसे ज्यादा मछलियों की डिमांड, वहां के व्यापारी सीधे कुंडा खां से ही खरीद रहे कुंडा खान की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके पास मछली खरीदने के लिए दिल्ली, गुजरात और पंजाब के व्यापारी सीधे बाड़मेर पहुंच रहे हैं। प्रजाति के अनुसार मछलियां 60 से 65 रुपए प्रति किलो के भाव से हाथों-हाथ बिक जाती हैं। वर्तमान में उनके पास 40 हजार मछलियां तैयार हो रही हैं, जिनकी बिक्री शुरू हो चुकी है। वरिष्ठ वैज्ञानिक कृषि विज्ञान केंद्र गुड़ामालानी डॉ. बीएल मीणा ने बताया कि बाड़मेर जैसे शुष्क क्षेत्र में मछली पालन एक साहसिक कदम है। कुंडा खान ने साबित किया कि यदि सही तकनीक अपनाई जाए तो रेगिस्तान में भी नीली क्रांति संभव है। तिलेपिया व ग्रास कार्प के चारे का खर्च कम कुंडा खान के तालाबों में रोहू, कतला, तिलेपिया, पंगास और ग्रास कार्प जैसी मछलियों का उत्पादन हो रहा है। तिलेपिया और ग्रास कार्प प्रजाति की मछलियां घास खाती हैं, जिससे चारे का खर्च बहुत कम आता है। मछली के पाचन तंत्र से निकला अपशिष्ट बेहतरीन फर्टिलाइजर (खाद) का काम करता है, जिसका उपयोग अन्य फसलों की पैदावार बढ़ाने में किया जा रहा है। ये मछलियां मात्र 5 से 6 महीने में बिक्री के लिए तैयार हो जाती हैं।