मां कहती थी उम्र भर पढ़ाया, मरने के बाद भी शरीर छात्रों के काम आए, इसलिए बेटे-बहू ने देहदान की ताकि पढ़ने को मिले मदद
भास्कर संवाददाता | श्रीगंगानगर दुनिया छोड़ने के बाद भी शहर की एक अध्यापिका की देह मेडिकल विद्यार्थियों के सीखने में मददगार साबित होगी। शहर के 91 एच ब्लॉक निवासी 78 वर्षीय शिक्षिका वीना कंसल के निधन के बाद उनके पुत्र डॉ. हरीश कंसल व पुत्रवधू डॉ. अंजू कंसल ने राष्ट्रीय रक्त नेत्र शरीर दान संघ श्रीगंगानगर के अध्यक्ष निर्मल जैन व मनोज कोहली को टांटिया मेडिकल कॉलेज के लिए उनका पार्थिव शरीर सौंपा। इस पुनीत कार्य में टांटिया यूनिवर्सिटी के डायरेक्टर डॉ. प्रवीण शर्मा व लखविंदर सिंह का सहयोग रहा। डॉ. हरीश कंसल ने बताया कि मां कहती थी कि उन्होंने जीवन का अधिकतर समय बच्चों को पढ़ाने में निकाला है। इसलिए मृत्यु के बाद उनकी देह का दान किया जाए, ताकि मेडिकल विद्यार्थियों की रिसर्च में काम आए। वर्तमान में डॉ. कंसल वृद्ध आश्रम मार्ग स्थित हनुमाननगर में रह रहे हैं। वीना कंसल का शुक्रवार को रात निधन होने पर बेटे डॉ. हरीश कंसल ने राष्ट्रीय नेत्र दान संघ के अध्यक्ष जैन से संपर्क किया। जैन शनिवार सुबह 9:30 बजे डॉ. कंसल के निवास पर पहुंचे। घर पर पार्थिव देह को पुष्पांजलि अर्पित कर टांटिया मेडिकल कॉलेज के लिए सुपुर्द कर दी गई। इस दौरान बेटी रेणु गुप्ता, दामाद अशोक गुप्ता, रक्तदान नेत्रदान के प्रेरक विनोद गुप्ता, अनिल टांटिया एडवोकेट कुलदीप गार्गी, गौरव गुप्ता, शिवदयाल गुप्ता, सुरेन्द्र गर्ग आदि मौजूद रहे। डॉ. हरीश कंसल ने बताया कि उनके पिता स्व. डॉ. बनारसीदास कंसल की भी इच्छा थी कि उनका देहदान किया जाए। इस पर मां वीना कंसल के साथ ही मैंने भी 1 दिसंबर 2025 को देहदान संकल्प पत्र भरा था। हमारा पूरा परिवार शिक्षा को समर्पित रहा है। श्रीगंगानगर-हनुमानगढ ़ के सरकारी मेडिकल कॉलेज ने देह लेने से मना कर दिया था: विदेशों मंे 4 से 5 डॉक्टरों पर एक बॉडी अनुसंधान के लिए दी जाती है, जबकि हमारे देश में 25 से 30 डॉक्टरों पर एक बॉडी मिल पाती है। श्रीगंगानगर जिले की बात करें तो यहां 19 साल में यह 28 वां देहदान है। देहदान के प्रति लगातार जागरूकता के प्रयास चल रहे हैं। करीब 300 लोगों ने देहदान संकल्प पत्र भर रखे हैं। इससे भी अधिक परेशानी की बात यह है कि शिक्षिका वीना कंसल निधन के बाद देहदान को लेकर पहले श्रीगंगानगर के सरकारी मेडिकल कॉलेज से संपर्क किया तो जवाब मिला कि शव रखने की जगह नहीं है। हनुमानगढ़ के मेडिकल कॉलेज से जवाब आया कि डॉक्टर की व्यवस्था ही नहीं है। इस पर टांटिया मेडिकल कॉलेज से संपर्क कर पार्थिव देह सुपुर्द की गई। - निर्मल जैन, अध्यक्ष, राष्ट्रीय रक्त-नेत्र शरीर दान संघ, श्रीगंगानगर। देहदान का सबसे बड़ा सकारात्मक प्रभाव चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में देखा जा सकता है। मेडिकल छात्रों को मानव शरीर की संरचना को समझने और सर्जरी का अभ्यास करने के लिए मृत शरीर (कैडेवर) की आवश्यकता होती है। देहदान के माध्यम से उपलब्ध होने वाले शव मेडिकल छात्रों को बेहतर प्रशिक्षण प्रदान करते हैं। देहदान नए चिकित्सा उपकरणों के विकास और बीमारियों के प्रभावों के अध्ययन में भी महत्वपूर्ण योगदान देता है।