कोटपूतली में लगातार दूसरे दिन जमाव बिंदु पर तापमान:कृषि विभाग ने पाले से बचाव के उपाय बताए, किसान चिंतित
पहाड़ों में हो रही बर्फबारी से मैदानी क्षेत्रों में कड़ाके की ठंड पड़ रही है। राजस्थान में शीतलहर का कहर जारी है, जहां कई जिलों में तापमान माइनस में पहुंच गया है। कोटपूतली में लगातार दूसरे दिन पाला पड़ने से किसानों की चिंता बढ़ गई है। सोमवार सुबह जब लोग घरों से बाहर निकले, तो उन्होंने छप्परों और फसलों पर बर्फ की चादर जमी देखी। इससे अगेती सरसों की फसल में नुकसान की आशंका जताई जा रही है। पाले का असर आलू, मिर्च, टमाटर जैसी सब्जियों के साथ-साथ सरसों की फसलों पर भी पड़ने की संभावना है। कोटपूतली-बहरोड़ जिला कृषि उपनिदेशक डॉ. रामजी लाल यादव ने बताया कि पाले से बचाव के लिए भूमि का तापमान बनाए रखना महत्वपूर्ण है। विशेषकर सीमित क्षेत्र वाली फसलों, पौधशालाओं, उद्यानों और नगदी सब्जियों के लिए यह आवश्यक है। उन्होंने सलाह दी कि फसलों को टाट, पट्टी या भूसी से ढकना लाभकारी होता है। साथ ही, हवा की दिशा को देखते हुए उत्तरी-पश्चिमी दिशा से आने वाली ठंडी हवाओं को अवरोधित करने से भी पाले का असर कम किया जा सकता है। पाले की संभावना होने पर किसानों को व्यवसायिक ग्रेड गंधक के तेजाब का छिड़काव करने की सलाह दी गई है। एक लीटर गंधक को एक हजार लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए। इसका प्रभाव लगभग दो सप्ताह तक रहता है और यदि पाले की आशंका बनी रहे, तो 15 दिन के अंतराल पर दोबारा छिड़काव किया जा सकता है। डॉ. यादव ने ये भी बताया कि पाले की आशंका वाले दिनों में फसलों में हल्की सिंचाई अवश्य करनी चाहिए। नमी युक्त भूमि में गर्मी अधिक समय तक बनी रहती है, जिससे भूमि का तापमान अचानक नहीं गिरता। इससे तापक्रम शून्य डिग्री सेल्सियस से नीचे जाने की संभावना कम हो जाती है और फसलें पाले से सुरक्षित रहती हैं।
पहाड़ों में हो रही बर्फबारी से मैदानी क्षेत्रों में कड़ाके की ठंड पड़ रही है। राजस्थान में शीतलहर का कहर जारी है, जहां कई जिलों में तापमान माइनस में पहुंच गया है। कोटपूतली में लगातार दूसरे दिन पाला पड़ने से किसानों की चिंता बढ़ गई है।
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सोमवार सुबह जब लोग घरों से बाहर निकले, तो उन्होंने छप्परों और फसलों पर बर्फ की चादर जमी देखी। इससे अगेती सरसों की फसल में नुकसान की आशंका जताई जा रही है। पाले का असर आलू, मिर्च, टमाटर जैसी सब्जियों के साथ-साथ सरसों की फसलों पर भी पड़ने की संभावना है।

