मेरा काम मेरा सच:लोग समझते हैं हम बस खड़े रहते हैं, हकीकत इससे अलग है
मैं साल 2019 से ट्रैफिक पुलिस में हूं। इससे पहले आरएएफ में सेवाएं दे चुका हूं। मेरी भर्ती वर्ष 2003 में हुई थी। ड्यूटी दोपहर 1 से रात 11 बजे तक रहती है। बीच में शाम 4 से 5 बजे तक एक घंटे का रेस्ट मिलता है, लेकिन इमरजेंसी में समय का कोई मतलब नहीं रह जाता। कई बार आधी रात को भी घर से निकलना पड़ता है। महीने में सिर्फ एक दिन का अवकाश मिलता है। दिसंबर-जनवरी में नए साल की वजह से छुट्टियां कैंसिल हो जाती हैं। त्योहारों के दौरान ड्यूटी और भी लंबी हो जाती है। जब पूरा शहर उत्सव मना रहा होता है, तब हम सड़क पर होते हैं। लोगों को लगता है कि हम तो बस खड़े रहते हैं, लेकिन यह काम बिल्कुल आसान नहीं है। लगातार छह घंटे खड़े रहने से पैरों में तेज दर्द होने लगता है। शहर के कई इलाकों में प्रदूषण बेहद ज्यादा है। हम मास्क भी नहीं पहन सकते, क्योंकि सीटी बजानी होती है। ट्रैफिक सिग्नल का टाइम मैनेजमेंट बहुत जरूरी है। रात 9 बजे के बाद ट्रैफिक कम हो जाता है, फिर भी कई जगह लाल बत्ती 50 सेकंड तक चलती रहती है। ऐसे में मैं कई बार कंट्रोल रूम से बात कर टाइम कम करवाता हूं। हर तीन महीने में हमारी ड्यूटी की जगह बदल दी जाती है। सॉफ्टवेयर के जरिए घर के पास पोस्टिंग मिल जाती है, जिससे थोड़ी राहत रहती है। नई जगह पहुंचकर मैं आसपास के दुकानदारों से बात करता हूं, इलाके को समझता हूं। कभी-कभी बोरियत होती है तो उन्हीं से दो बातें कर लेता हूं। काम की चुनौतियां इतनी ज्यादा थीं कि एक समय मुझे बहुत गुस्सा आने लगा। आखिरकार डॉक्टर से सलाह ली। उन्होंने मेडिटेशन की सलाह दी। अब हालात पहले से बेहतर हैं। रोज अलग-अलग तरह के लोगों से सामना होता है। कोई अशोभनीय व्यवहार करता है, कोई बिना हेलमेट चलता है, तो कोई फोन पर बात करते हुए गाड़ी चलाता है। हंसी-मजाक के किस्से भी होते हैं। कोई हाथ जोड़ लेता है, तो 10 लाख की गाड़ी में बैठा आदमी कहता है ‘साहब, मैं गरीब हूं, चालान मत काटो।’ एक बार 9-10 साल के बच्चे को बिना हेलमेट एक्टिवा चलाते देखा। रोका तो बोला ‘माफ कर दो अंकल, मम्मी ने मना किया था, फिर भी ले आया।’ मैंने उसके पिता को फोन किया, बच्चे को समझाया और छोड़ दिया। मैं सिर्फ ट्रैफिक कंट्रोल नहीं करता। मैं रोज शहर की जल्दबाजी का गवाह बनता हूं। -जैसा ईशा सिंह को बताया