वेनेज़ुएला पर भारत के बयान की विदेश नीति के विश्लेषक क्यों कर रहे हैं आलोचना?
वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति को पकड़ने के लिए अमेरिकी कार्रवाई को लेकर पूरी दुनिया में हलचल है और भारत ने बयान जारी किया है. इस बयान के बाद विदेश नीति के विश्लेषक भारत के बयान पर टिप्पणी कर रहे हैं.
वेनेज़ुएला पर भारत के बयान की विदेश नीति के विश्लेषक क्यों कर रहे हैं आलोचना?

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इमेज कैप्शन, वेनेज़ुएला के मामले पर भारत के विदेश मंत्रालय ने बयान दिया है जिसको लेकर कहा जा रहा है कि यह काफ़ी सतर्कतापूर्ण भरा है
5 जनवरी 2026
एक नाटकीय घटनाक्रम में अमेरिका के विशेष सैन्य दस्ते ने शनिवार तड़के वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ़्लोरेस को राजधानी काराकास से पकड़ लिया.
उन्हें न्यूयॉर्क ले जाया गया है और वहां ड्रग्स तस्करी के आरोपों में उन पर मुक़दमा चलाया जाएगा. हालांकि मादुरो बार-बार इन आरोपों का खंडन कर चुके हैं और इसे देश में तेल के विशाल भंडार पर क़ब्ज़े का बहाना बताते रहे हैं.
वेनेज़ुएला पर हुई इस कार्रवाई ने पूरी दुनिया को सकते में डाल दिया है. अमेरिका के इस क़दम को दुनिया के कई देशों ने 'एकतरफ़ा और संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के ख़िलाफ़ की गई कार्रवाई' बताया.
चीन ने मादुरो को तत्काल रिहा किए जाने की मांग करते हुए कहा था कि अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय क़ानून का उल्लंघन किया है और दक्षिण अमेरिका क्षेत्र में ख़तरा पैदा किया है.
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जबकि पाकिस्तान ने कहा कि सभी मुद्दों का समाधान संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतरराष्ट्रीय क़ानून के सिद्धांतों के तहत किया जाना चाहिए.
ईसाई धर्मगुरु पोप लिओ ने वेनेज़ुएला की संप्रभुता की गारंटी देने की अपील की.
इस मामले में भारत ने काफ़ी सतर्कता के साथ प्रतिक्रिया दी जिसकी काफ़ी आलोचना हो रही है.
भारत के बयान में क्या था?

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इमेज कैप्शन, भारतीय विदेश मंत्रालय ने वेनेज़ुएला के मामले पर पूरे 24 घंटे बाद बयान जारी किया था
अमेरिकी कार्रवाई के लगभग 24 घंटे बाद रविवार को भारतीय विदेश मंत्रालय ने बयान जारी किया.
बयान में कहा गया, "भारत वेनेज़ुएला के लोगों की सुरक्षा और उनकी भलाई के लिए अपने समर्थन को फिर से दोहराता है. हम सभी संबंधित पक्षों से अपील करते हैं कि मुद्दों का समाधान बातचीत के ज़रिए और शांतिपूर्ण तरीक़े से किया जाए, ताकि क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनी रहे."
इससे पहले भारत ने शनिवार रात अपने नागरिकों को वेनेज़ुएला की यात्रा को लेकर एक एडवाइज़री जारी की थी. भारत सरकार ने लोगों से कहा था कि वे वेनेज़ुएला की सभी गै़र-ज़रूरी यात्राओं से बचें.
सरकार के इस बयान को लेकर भारत की विपक्षी पार्टियों में असहजता देखने को मिल रही है और कई लोगों ने अमेरिकी आक्रामकता की निंदा न करने की आलोचना की.
रविवार को कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा, "कांग्रेस पार्टी पिछले 24 घंटों में वेनेज़ुएला में अमेरिका की कार्रवाई पर गहरी चिंता जताती है. अंतरराष्ट्रीय क़ानून के तय सिद्धांतों का एकतरफ़ा उल्लंघन नहीं किया जा सकता."
अंग्रेज़ी अख़बार द टेलीग्राफ़ ने लिखा कि नई दिल्ली ने, अमेरिका के गुप्त अभियान के 24 घंटे बाद प्रतिक्रिया दी.
अख़बार ने आगे लिखा, "ये प्रतिक्रिया वैसी ही थी, जैसी भारत ने फ़रवरी 2022 में रूस के यूक्रेन पर हमले के समय दी थी. तब उसने किसी एक पक्ष का खुलकर समर्थन करने से परहेज़ किया था."
भारत की पांच लेफ़्ट पार्टियों ने की अपील

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इमेज कैप्शन, सीपीआई (एम) महासचिव एमए बेबी, सीपीआई महासचिव डी राजा और सीपीआई (एमएल)- लिबरेशन महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य (बाएं से दाएं)
भारत की लेफ़्ट पार्टियों ने वेनेज़ुएला में अमेरिकी हमले और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को 'पकड़ने' की कार्रवाई की निंदा की है.
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी सीपीआई (एम) ने एक्स पर एक बयान जारी किया है. सीपीआई (एम) ने लिखा, "लेफ़्ट पार्टियां अमेरिकी आक्रामकता के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन का आह्वान करती हैं."
यह बयान सीपीआई, सीपीआई (एम), सीपीआई, सीपीआई (एमएल)-लिबरेशन, आरएसपी (रिवॉल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी), एआईएफ़बी (ऑल इंडिया फ़ॉर्वर्ड ब्लॉक) की ओर से जारी किया गया है.
इसमें कहा गया है, "हम वेनेज़ुएला के ख़िलाफ़ अमेरिकी आक्रामकता और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ़्लोरेस के अपहरण की कड़े शब्दों में निंदा करते हैं. यह संयुक्त राष्ट्र चार्टर का खुला उल्लंघन करते हुए एक संप्रभु राष्ट्र पर किया गया हमला है."
बयान में कहा गया, "हम लेफ़्ट पार्टियां अमेरिकी आक्रामकता के ख़िलाफ़ और लैटिन अमेरिका के लोगों के साथ एकजुटता में देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों का आह्वान करते हैं."
"भारत सरकार को चाहिए कि वह दुनिया भर के उन देशों को समर्थन दे, जो अमेरिकी आक्रामकता की निंदा कर रहे हैं और वेनेज़ुएला के साथ मज़बूती से खड़े हों."
भारत के बयान की क्यों हो रही आलोचना

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इमेज कैप्शन, निकोलस मादुरो को न्यूयॉर्क ले जाया गया है जहां उन पर मुक़दमा चलाया जाएगा.
वेनेज़ुएला के घटनाक्रम पर भारत के बयान की कई लोगों ने आलोचना की है.
राज्यसभा में आरजेडी सांसद मनोज झा ने कहा, "वेनेज़ुएला के तेल के लिए कोई भी बहाना बनाया जाए लेकिन इतिहास कभी माफ़ नहीं करेगा. हमें भी माफ़ नहीं करेगा क्योंकि अभी तक हमारी ओर से किंतु-परंतु वाली भाषा इस्तेमाल हो रही है. ये हमारा भारत वर्ष नहीं है, जो सन् 1952-54 में भी ऐसा कुछ होता था तो भारत बयान देता था."
अंतरराष्ट्रीय मामलों पर नज़र रखने वाले पत्रकार शशांक मट्टू ने लिखा, "भारत ने वेनेज़ुएला में अमेरिकी ऑपरेशन को लेकर चिंता जताई लेकिन निंदा नहीं की."
सदर्न कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी से संबद्ध यूएससी डोर्नसिफ़ कॉलेज ऑफ़ लेटर्स, आर्ट्स एंड साइंसेज़ में प्रोफ़ेसर डेरेक जे ग्रॉसमैन ने एक्स पर भारत के विदेश मंत्रालय का बयान लगाते हुए लिखा, "भारत, वेनेज़ुएला में ट्रंप के सैन्य घुसपैठ की निंदा नहीं करेगा."
वॉशिंगटन स्थित भू-राजनीतिक रणनीतिकार और फॉरेन पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट में नेशनल सिक्योरिटी सीनियर फ़ेलो जॉन सिटिलिडीस ने कहा, "भारत हमेशा अमेरिका के लिए बेहद अहम केंद्र बिंदु रहा है. यह एशिया में और वैश्विक स्तर पर हमारे सबसे महत्वपूर्ण साझेदारों में से एक है. लेकिन यह एक ऐसा ऑपरेशन था, जिसे 'नेशनल प्राइमेसी थ्योरी' के तहत अंजाम दिया गया. यही वह ढांचा है, जो ट्रंप व्हाइट हाउस की नेशनल सिक्योरिटी स्ट्रैटेजी में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है."
उन्होंने संकेत दिया कि भारत और अमेरिका साथ मिलकर साझा हितों के लिए काम करते रहेंगे.
'विदेश नीति को बदलने की ज़रूरत'
भारत और चीन के रिश्ते पर एक्सपर्ट ज़ोरावर दौलत सिंह ने भारतीय बयान को चिंताजनक और इसकी विदेश नीति को पूरी तरह बदलने की बात कही है.
उन्होंने एक्स पर भारत का बयान साझा करते हुए लिखा, "असल चिंता की बात यह है कि यह भारत के अपने आसपास होने वाले सत्ता परिवर्तनों पर दी जाने वाली एक सामान्य प्रतिक्रिया बन सकती है."
"भारतीय विदेश नीति को विचारों के स्तर पर बड़े बदलाव की ज़रूरत है, क्योंकि इस तरह की प्रतिक्रिया न तो कोई ठोस लाभ दिलाएगी और न ही अमेरिका की भविष्य की आक्रामक कार्रवाइयों को रोक पाएगी."
उन्होंने आगे लिखा, "इससे यह संकेत जाता है कि भारत के आधिकारिक बयान अप्रासंगिक हो चुके हैं."
वहीं रणनीतिक मामलों के जानकार ब्रह्मा चेलानी ने भी एक्स पर अपनी राय ज़ाहिर की है. उन्होंने भारतीय विदेश मंत्रालय के बयान पर लिखा, "इसे 'गहरी चिंता का मामला' बताकर, नई दिल्ली ने यह संकेत दिया है कि वह ट्रंप प्रशासन के साथ रिश्ते ख़राब किए बिना, एकतरफ़ा मिलिट्री कार्रवाई का समर्थन नहीं करती है."
"हालांकि, आलोचक यूएन चार्टर के आर्टिकल 2(4) (बल प्रयोग पर रोक) के खुले उल्लंघन की निंदा करने में भारत की नाकामी की ओर इशारा करेंगे और यह तर्क देंगे कि भारत ग्लोबल साउथ के लीडर के तौर पर अपनी स्थिति को कमज़ोर करने का जोखिम उठा रहा है."
बयान का बचाव भी हो रहा

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इमेज कैप्शन, कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने कहा है कि भारत सरकार के ऊपर है कि वो कैसी प्रतिक्रिया दे
हालांकि कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने परोक्ष रूप से भारत की प्रतिक्रिया को मौजूदा संवेदनशील हालात में ठीक बताया.
उन्होंने कहा कि वेनेज़ुएला मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए भारत सरकार पर छोड़ते हैं कि वो कैसे प्रतिक्रिया व्यक्त करे.
उन्होंने कहा, "संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतरराष्ट्रीय क़ानून का लगातार उल्लंघन हो रहा है. हम जिस स्थिति को देख रहे हैं, वह विश्व व्यवस्था के टूटने और उसके स्थान पर अव्यवस्था के आने का संकेत है. ऐसी उथल-पुथल में 'जिसकी ताक़त, उसकी बात' का सिद्धांत जंगल के क़ानून में बदलने का ख़तरा पैदा कर रहा है. भारत न तो छोटा देश है और न ही महाशक्ति, और हमें इस दौर से बेहद चतुर कूटनीति के साथ गुज़रना होगा."
द हिंदू की राजनयिक मामलों की संपादक सुहासिनी हैदर ने भारत की सधी प्रतिक्रिया के पीछे अमेरिका के साथ व्यापार समझौता वार्ता को वजह बताया है.
उन्होंने एक्स पर लिखा, "अमेरिका के वेनेज़ुएला पर हमले पर मोदी सरकार ने सतर्क रुख़ अपनाया. राजनयिक विशेषज्ञों का कहना है कि विदेश मंत्रालय का बयान यूक्रेन, ग़ज़ा और ईरान पर भारत की हालिया स्थितियों के अनुरूप है. भारत-अमेरिका व्यापार समझौता इस समय अहम दौर में है, इसे भी एक बड़ी चिंता माना जा रहा है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.