ख़ालिदा ज़िया के भारत के जलपाईगुड़ी में जन्म और उनके पिता इस्कंदर मजूमदार के बारे में जानिए
SOURCE:BBC Hindi
''ख़ालिदा के पिता इस्कंदर मजूमदार आठवीं क्लास की पढ़ाई के बाद जलपाईगुड़ी में अपनी बहन और बहनोई के पास चले गए थे. उन्होंने वहीं से मैट्रिक की परीक्षा पास की और एक चाय बागान में नौकरी शुरू की.''
ख़ालिदा ज़िया के भारत के जलपाईगुड़ी में जन्म और उनके पिता इस्कंदर मजूमदार के बारे में जानिए
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Author, अमिताभ भट्टसाली
पदनाम, बीबीसी न्यूज़ बांग्ला, कोलकाता
2 घंटे पहले
"ख़ालिदा ज़िया का जन्म हमारे घर के ठीक सामने वाले मकान में हुआ था. देश के विभाजन के बाद संपत्ति की अदला-बदली के समय अमरेंद्र नाथ चक्रवर्ती पूर्वी पाकिस्तान से इस घर में रहने आए और यहाँ रह रहा ख़ालिदा ज़िया का परिवार पूर्वी पाकिस्तान चला गया था."
पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी ज़िले की नई बस्ती में रहने वाले भोला मंडल ने यह बात बताई. वह ज़िला खेल संघ के सचिव भी हैं.
बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की अध्यक्ष ख़ालिदा ज़िया के निधन के बाद उनके जन्मस्थान पर नए सिरे से चर्चा हो रही है.
भारत और बांग्लादेश के अख़बारों और सोशल मीडिया में ख़ालिदा ज़िया के जन्मस्थान को लेकर सूचनाओं की भरमार है.
यह बहस तेज़ हो गई है कि उनका जन्म बांग्लादेश के दिनाजपुर में हुआ था या भारत के जलपाईगुड़ी में. दोनों दावों के पक्ष और विपक्ष में दलीलें दी जा रही हैं.
ख़ालिदा के निधन के बाद उनकी पार्टी बीएनपी की ओर से जारी संक्षिप्त जीवनी में बताया गया था कि उनका जन्म जलपाईगुड़ी में हुआ था.
लेकिन ख़ालिदा की जीवनी लिखने वाले पत्रकार (अब दिवंगत) महफू़ज़ उल्लाह ने अपनी किताब 'बेगम ख़ालिदा ज़िया- हर लाइफ़, हर स्टोरी' में लिखा है कि उनका जन्म दिनाजपुर में हुआ था.
हालांकि उस किताब में लिखा है कि ख़ालिदा के पिता इस्कंदर मजूमदार आठवीं क्लास की पढ़ाई के बाद जलपाईगुड़ी में अपनी बहन और बहनोई के पास चले गए थे. उन्होंने वहीं से मैट्रिक की परीक्षा पास की और एक चाय बागान में नौकरी शुरू की.
उसके बाद उन्होंने चाय का कारोबार शुरू किया. तत्कालीन ब्रिटिश भारत के जलपाईगुड़ी में 1937 में उनकी शादी हुई थी.
जलपाईगुड़ी पश्चिम बंगाल के उत्तरी इलाक़े में बांग्लादेश की सीमा से सटा एक ज़िला मुख्यालय शहर है.
वहां रहने वाले कई लोगों ने दावा किया है कि ख़ालिदा के पिता इस्कंदर मजूमदार वहीं नई बस्ती में रहते थे और उनका जन्म भी वहीं हुआ था. लेकिन इस दावे पर भी संदेह जताए जा रहे हैं. लोगों में इस मुद्दे पर मतभेद भी सामने आए हैं.
ख़ालिदा ज़िया के जन्मस्थान का पता लगाने के दौरान बीबीसी बांग्ला को एक ही लिखित संस्मरण मिला है जिसमें, उनके जन्म के बारे में कुछ जानकारी है. लेकिन उस पर शोधकर्ताओं में मतभेद भी हैं.
इसके अलावा ख़ालिदा ज़िया के पति जहां नौकरी करते थे, वहाँ से भी कुछ जानकारी मिली है.
बीबीसी बांग्ला ने इस दौरान मिली जानकारियों और मतभेदों को इस रिपोर्ट के ज़रिए सामने रखने की कोशिश की है.
इमेज कैप्शन, जलपाईगुड़ी शहर के जिस मकान में ख़ालिदा का जन्म होने का दावा किया जा रहा है वो अब इस हालत में है
बीएनपी से मिली जीवनी
बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के मीडिया सेल ने ख़ालिदा ज़िया की जो संक्षिप्त जीवनी जारी की है, उसमें बताया गया है, जिया का पैतृक आवास फेनी ज़िले के फूलगाजी उपजिले के तहत श्रीरामपुर गाँव के मजूमदार बाड़ी में है.
उनके पिता इस्कंदर मजूमदार एक व्यापारी थे. इस्कंदर वर्ष 1919 में फेनी से जलपाईगुड़ी पहुंचे थे. बहन के घर रह कर मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद वो चाय के कारोबार में शामिल हो गए.
इसमें बताया गया है कि इस्कंदर की शादी वर्ष 1937 में जलपाईगुड़ी में हुई थी. वो वहां नई बस्ती इलाक़े में वर्ष 1947 तक रहे थे. उनका निधन 15 नवंबर 1984 के हुआ था. ख़ालिदा की मां बेगम तैयबा मजूमदार एक गृहिणी थीं.
इमेज कैप्शन, पत्रकार महफू़ज़ उल्लाह (दिवंगत) की किताब में ख़ालिदा ज़िया का जन्मस्थान दिनाजपुर बताया गया है
जलपाईगुड़ी के लोगों का क्या कहना है?
जलपाईगुड़ी शहर के जिस नई बस्ती इलाक़े में खालिदा जिया का जन्म होने का दावा किया जा रहा है, वहाँ रहने वाले कुछ लोगों ने उनके पिता इस्कंदर मजूमदार के निवास के तौर पर एक मकान की शिनाख्त की है. फ़िलहाल अरिंदम चक्रवर्ती उस घर के मालिक हैं.
उनके साथ तो संपर्क नहीं हो सका. लेकिन ख़ालिदा के कुछ पड़ोसियों के अलावा ज़िला खेल संघ के सचिव भोला मंडल ने ख़ालिदा का जन्म उसी घर में होने का दावा किया है.
भोला मंडल ने स्थानीय पत्रकारों को बताया है कि इस्कंदर मजूमदार उनके घर के ठीक सामने वाले मकान में रहते थे.
उनका कहना था, "ख़ालिदा ज़िया का जन्म हमारे घर के ठीक सामने वाले मकान में हुआ था. देश की आज़ादी के बाद संपत्ति की अदला-बदली के समय अमरेंद्र नाथ चक्रवर्ती सीमा पार से यहां आ गए और ख़ालिदा ज़िया का परिवार तब पूर्वी पाकिस्तान चला गया था."
मंडल का दावा है कि उनकी मां ने बचपन में ख़ालिदा को अपनी गोद में भी खिलाया था.
इलाक़े के कई अन्य लोगों ने भी स्थानीय पत्रकारों से बातचीत में ख़ालिदा खानम का जन्म उसी मोहल्ले में होने का दावा किया है. ज़ियाउर रहमान के साथ शादी के बाद उनका नाम खालिदा ज़िया हो गया था.
शहर के नई बस्ती इलाके में रहने वाले उन लोगों का कहना है कि ख़ालिदा के परिवार के साथ उनकी पहले की पीढ़ी के लोगों यानी माता-पिता के संबंध थे. लेकिन उनके पास इस बात का कोई सबूत नहीं है.
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इमेज कैप्शन, इस पुस्तक में खालिदा जिया और उनके पिता इस्कंदर मजूमदार का जिक्र किया गया है
कौन थे इस्कंदर मजूमदार?
बीएनपी की ओर से मीडिया को दी गई ख़ालिदा की जीवनी में बताया गया है कि उनके पिता इस्कंदर मजूमदार ने जलपाईगुड़ी में चाय का कारोबार शुरू किया था.
बीबीसी बांग्ला को महज दो ऐसी सूचनाएं मिली हैं, जिनमें ख़ालिदा के पिता के आवास और कार्यस्थल के बारे में जानकारी दी गई है.
इनमें से एक है, जलपाईगुड़ी शहर के इतिहास पर प्रकाशित एक संस्मरण और दूसरा उस संस्था के हिसाब-किताब का एक पुराना रजिस्टर, जहाँ इस्कंदर मजूमदार काम करते थे.
जलपाईगुड़ी के पुराने वाशिंदे और मशहूर सांस्कृतिक व्यक्तित्व कामाख्या प्रसाद चक्रवर्ती के लिखे उस संस्मरण में इस्कंदर मजूमदार का नाम इस्कंदर मियां और चाय का कारोबार करने वाली संस्था का नाम 'दास एंड कंपनी' लिखा है. उस कंपनी के रजिस्टर में ख़ालिदा के पिता का मोहम्मद इस्कंदर के तौर पर ज़िक्र किया गया है.
इस रिपोर्ट की शुरुआत में जिस भोला मंडल का ज़िक्र किया गया है, उनका परिवार इस्कंदर मियां का पड़ोसी था. कामाख्या प्रसाद चक्रवर्ती के संस्मरण में भी इस बात का ज़िक्र है.
'उस दौर का जलपाईगुड़ी शहर और सामाजिक जीवन की कुछ बातें' शीर्षक उस संस्मरण में चक्रवर्ती ने लिखा है, "हेमचंद्र मंडल इस्कंदर मियां के मकान वाली गली में रहते थे. वो ईसाई थे. हेमचंद्र मंडल शहर के पुराने वाशिंदा हैं. जलपाईगुड़ी शहर के कलेक्टरेट ऑफिस जाते समय पुराने सर्किट हाउस से कुछ आगे एक चर्च है. सेंट माइकल एंजेल चर्च. उस चर्च का निर्माण वर्ष 1897 में हुआ था. ज़िले के चाय बागान मैनेजरों की पहल पर."
कामाख्या प्रसाद ने लिखा है कि हेमचंद्र मंडल उस चर्च के पहले पादरी थे. उनके निधन के बाद सबसे बड़े पुत्र नब कुमार मंडल और उनकी मौत के बाद भाई अजित कुमार मंडल उस चर्च के पादरी बने थे.
उन्होंने अपनी पुस्तक में लिखा है कि फ़िलहाल अजित कुमार मंडल के पुत्र भोला मंडल उस चर्च के पादरी हैं.
उस संस्मरणात्मक पुस्तक में लिखा है, "रेसकोर्स के रास्ते में नगर पालिका और बाद में बने इलेक्ट्रिक सप्लाई कंपनी से कुछ आगे जाने के बाद दक्षिण की ओर सड़क के किनारे ही अलीमुद्दीन मियां रहते थे. उनके घर के बाद ही इस्कंदर मियां का घर था. रजत मुखर्जी के पिता ने बाद में उस घर को ख़रीद लिया. फ़िलहाल रजत मुखर्जी नए सिरे से उस घर को बनवा कर वहां रह रहे हैं."
लेकिन स्थानीय मीडिया में जिस घर को ख़ालिदा ज़िया का बताया जा रहा है, उसके मालिक अब अरिंदम चक्रवर्ती हैं.
चक्रवर्ती की ओर से लिखी गई पुस्तक की भूमिका उत्तर बंगाल विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर एमेरिटस आनंद गोपाल घोष ने लिखी थी. वो भी जलपाईगुड़ी के ही रहने वाले थे.
उन्होंने बीबीसी बांग्ला को बताया, "उस पुस्तक की भूमिका लिखते समय मुझे ख़ालिदा के पिता इस्कंदर मियां के कामकाज़ और ख़ालिदा के जन्म से संबंधित जानकारी मिली थी. मजूमदार एक ऐसी उपाधि है जो हिंदू और मुसलमान दोनों तबके के लोग इस्तेमाल करते थे. मुझे कामाख्या प्रसाद से ख़ालिदा ज़िया के परिवार के इतिहास के बारे में कई जानकारियां मिली थीं. मुझे नहीं पता कि इसके अलावा कोई दूसरी जानकारी है या नहीं. अगर कोई जानकारी रही भी होगी तो शायद वो वर्ष 1968 की भयावह बाढ़ में नष्ट हो गई हो."
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इमेज कैप्शन, पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु के साथ ख़ालिदा ज़िया
क्या करते थे इस्कंदर मजूमदार?
इतिहास के प्रोफेसर आनंद गोपाल घोष ने बताया कि ख़ालिदा ज़िया के पिता इस्कंदर मजूमदार जलपाईगुड़ी की दास एंड कंपनी में चाय के कारोबार के साथ जुड़े थे.
हालांकि उस कंपनी के तत्कालीन मालिक मनोरंजन दासगुप्ता के पुत्र नीलांजन दासगुप्ता ने बीबीसी बांग्ला को बताया है कि सही मायनों में कंपनी चाय का कारोबार नहीं करती थी. वो बैंकिंग और चाय बागान कंपनियों के शेयरों की ख़रीद-फ़रोख्त का काम करती थी.
नीलांजन बताते हैं, "उस समय चाय बागान के शेयरों की भारी मांग थी. मेरे पिता की कंपनी के ज़रिए रंगपुर और नीलफामारी से लेकर बिहार के कटिहार तक चाय बागानों के शेयरों का कारोबार होता था. मैंने पिता के मुंह से, ही सुना था कि ख़ालिदा जिया के पिता चाय बागान के शेयरों की ख़रीद-फ़रोख्त के काम से जुड़े थे."
वो बताते हैं, "मेरे पास पुराने दौर के कई बही-खाते हैं. उनमें से एक में ख़ालिदा ज़िया के पिता के नाम का ज़िक्र है. वो वर्ष 1954 का है. उसमें इस बात का ज़िक्र है कि इस्कंदर ने कंपनी से कितनी अग्रिम रक़म ली और कितना लौटाया है. हालांकि उसमें उनका नाम मोहम्मद इस्कंदर लिखा है. लेकिन वर्ष 1954 के बाद किसी खाते में उनके नाम का ज़िक्र नहीं है. यानी माना जा सकता है कि उसके बाद वो मेरे पिता की कंपनी से नहीं जुड़े थे."
इतिहास के प्रोफेसर आनंद गोपाल घोष ने बीबीसी बांग्ला से कहा, "जहां तक पता चला है, इस्कंदर मियां वृहत्तर नोआखाली के फेनी इलाक़े के रहने वाले थे. उस समय जलपाईगुड़ी में कई धनी प्रवासी मुसलमान परिवार रहते थे. इसके साथ ही हमारे जैसे प्रवासी हिंदू परिवार भी शहर में रहते थे. यह शहर उस समय चाय के कारोबार का केंद्र था. इस्कंदर मियां चाय ब्रोकर के तौर पर काम करते थे. लेकिन आज की तरह तब ब्रोकर का मतलब दलाल नहीं था, वह बेहद सम्मानजनक और लाभदायक पेशा था."
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इमेज कैप्शन, जलपाईगुड़ी सदर गर्ल्स प्राइमरी स्कूल. इसी स्कूल में ख़ालिदा के पढ़ने का दावा किया जा रहा है
क्या ख़ालिदा ने जलपाईगुड़ी के स्कूल में पढ़ाई की है?
प्रोफेसर आनंद गोपाल घोष बताते हैं कि वर्ष 1947 में देश के विभाजन के बाद भी ख़ालिदा का परिवार जलपाईगुड़ी में ही रहता था. लेकिन वर्ष 1950 में हुए एक सांप्रदायिक दंगे के बाद वो पूर्वी पाकिस्तान चला गया था.
घोष बताते हैं, वर्ष 1950 में शहर में हुए एक दंगे में तीन मुसलमानों की मौत हो गई थी. उस समय कलेक्टर ने कर्फ्यू जारी कर परिस्थिति को काबू में किया था.
उसी साल नेहरू और लियाक़त के बीच हुए समझौते के मुताबिक़ भारत और पाकिस्तान के बीच लोगों की अदला-बदली शुरू हुई थी. शायद उसी समय इस्कंदर मियां अपने परिवार साथ भारत छोड़ कर चले गए थे.
घोष के मुताबिक़ कामाख्या चक्रवर्ती ने उनको बताया था कि ख़ालिदा का दाखिला शहर के साबेरिया प्राइमरी स्कूल में हुआ था. वह स्कूल अब भी मौजूद है.
दूसरी ओर, कुछ लोग ख़ालिदा के सदर गर्ल्स प्राइमरी स्कूल में पढ़ने का दावा कर रहे हैं.
लेकिन जलपाईगुड़ी के रहने वाले शोधकर्ता गौतम गुहाराय बीबीसी बांग्ला से कहते हैं, "ख़ालिदा ज़िया का जन्म और स्कूली पढ़ाई यहाँ होने के दावे तो सामने आते रहे हैं. लेकिन काफ़ी कोशिश करने के बावजूद मुझे इसका कोई ठोस सबूत नहीं मिला है. इससे पहले इस शहर से उनके संबंधों की जानकारी कभी सामने नहीं आई थी. उनके निधन के बाद अचानक तमाम बातें सामने आ रही हैं.
उनका कहना था, एक बार हसन अजीजुल हक़ बीएनपी के कुछ युवा नेताओं के साथ जलपाईगुड़ी आए थे. बातचीत के दौरान मैंने उनको बताया था कि ख़ालिदा ज़िया का जन्म यहां हुआ था और उन्होंने कुछ समय तक एक स्थानीय स्कूल में भी पढ़ाई की थी. वो यह सुन कर चकित रह गए थे. उन्होंने फौरन ढाका संपर्क किया. उसके बाद अजीजुल ने हमें बताया था कि ख़ालिदा का जन्म यहां होने की जानकारी सही नहीं है."
गौतम गुहाराय के मुताबिक़ एक बार ढाका में बीएनपी के एक वरिष्ठ नेता के साथ बातचीत के दौरान यह प्रसंग उठने पर उन्होंने भी अजीजुल की बात को ही दोहराया था.
गौतम बताते हैं, "बांग्लादेश से लौटने के बाद मैंने उस स्कूल में भी पता लगाया ,जहाँ ख़ालिदा के पढ़ने की बात कही जा रही है. लेकिन वहां के शिक्षक मुझे इससे संबंधित कोई प्रमाण या दस्तावेज नहीं दिखा सके. कइयों का कहना था कि शायद वर्ष 1968 की बाढ़ में दस्तावेज़ नष्ट हो गए थे. लेकिन हमें उससे पहले के कई अन्य दस्तावेज मिले हैं, ख़ालिदा से संबंधित कोई दस्तावेज़ नहीं मिला है."
गुहाराय का कहना है कि ख़ालिदा का परिवार जब भारत छोड़कर गया था तब उनकी उम्र चार या पांच साल रही होगी. उस दौर में बच्चों का इतनी कम उम्र में स्कूलों में दाखिला नहीं कराया जाता था.
उनका सवाल था, "ऐसे में ख़ालिदा ने जलपाईगुड़ी के स्कूल में पढ़ाई कैसे की?"
दूसरी ओर, दास एंड कंपनी के खातों में वर्ष 1954 तक मोहम्मद इस्कंदर का ज़िक्र मिलता है. काम के सिलसिले में अगर वो तब तक जलपाईगुड़ी में रहे भी हों तो उनके परिवार के बाकी सदस्य शायद यहां नहीं थे.
बीएनपी की ओर से जारी ख़ालिदा की जीवनी में लिखा है, "ख़ालिदा का स्कूली जीवन पांच साल की उम्र में दिनाजपुर मिशन स्कूल में शुरू हुआ था. इसके बाद उनका दाखिला दिनाजपुर गर्ल्स स्कूल में हुआ था. ख़ालिदा ने आगे की पढ़ाई सुरेंद्रनाथ कॉलेज से की."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.