ख़ालिदा ज़िया के पति ज़ियाउर रहमान की क़ब्र से शव निकाल दोबारा दफनाने की कहानी
बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री ख़ालिदा ज़िया को भी ज़ियाउर रहमान की क़ब्र के बगल में ही दफनाया गया है. लेकिन ज़ियाउर रहमान की यह कोई पहली क़ब्र नहीं थी.
ख़ालिदा ज़िया के पति ज़ियाउर रहमान की क़ब्र से शव निकाल दोबारा दफनाने की कहानी

इमेज स्रोत, Getty Images
इमेज कैप्शन, ख़ालिदा ज़िया का इसी हफ़्ते मंगलवार को निधन हो गया था
-
- Author, रक़ीब हसनत
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ बांग्ला
- 3 घंटे पहले
बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की अध्यक्ष रहीं ख़ालिदा ज़िया को ढाका के शेरे-ए-बांग्ला नगर में उनके दिवंगत शौहर ज़ियाउर रहमान की क़ब्र के पास दफनाया गया है.
बांग्लादेश के पूर्व राष्ट्रपति और मुक्ति युद्ध के दौरान एक प्रमुख कमांडर रहे ज़ियाउर रहमान की चटगांव में 30 मई, 1981 को सैन्य तख्तापलट के प्रयास के दौरान हत्या कर दी गई थी.
उसके बाद उनके शव को पहले चटगांव के रंगुनिया पहाड़ी इलाके में दफनाया गया था.
तत्कालीन सरकार की पहल पर बाद में उनके शव को ढाका लाकर तत्कालीन शेर-ए-बांग्ला पार्क में राजकीय सम्मान के साथ दफ़नाया गया था.
बाद में हुसैन मोहम्मद इरशाद सरकार के कार्यकाल के दौरान शेर-ए-बांग्ला नगर में संसद से सटे इस पार्क का नाम 'चंद्रिमा उद्यान' रखा गया था. उसके बाद बीएनपी सरकार ने इसका नाम बदल कर 'ज़िया उद्यान' कर दिया था.
बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
उसके बाद सत्ता संभालने वाली अवामी लीग सरकार के कार्यकाल में इसका नाम फिर से 'चंद्रिमा उद्यान' कर दिया गया. लेकिन अवामी लीग सरकार के पतन के बाद अब वहां 'जिया उद्यान' का ही साइनबोर्ड नज़र आ रहा है.
राजनीतिक इतिहास के शोधकर्ता और लेखक मोहिउद्दीन अहमद बताते हैं, "इस पार्क का नाम बदलने के पीछे चाहे जो भी कारण रहा हो, वहाँ ज़ियाउर रहमान को राजकीय सम्मान के साथ दफ़नाने का फ़ैसला तत्कालीन अस्थायी राष्ट्रपति जस्टिस अब्दुस सत्तार के नेतृत्व वाली सरकार ने लिया था."
ज़ियाउर रहमान के जनाज़े और उनको दफ़नाने के दौरान अब्दुस सत्तार के मंत्रिमंडल में उपमंत्री रहे एबीएम रुहुल हावलादार अमीन भी मौजूद थे.
अमीन ने बीबीसी बांग्ला को बताया, "यह प्रस्ताव जस्टिस अब्दुस सत्तार ने ही रखा था. कैबिनेट ने आमराय से इस पर मुहर लगा दी. बाद में सेना प्रमुख इरशाद ने भी इसका समर्थन किया. ज़ियाउर रहमान ने देश में बहुदलीय लोकतंत्र की स्थापना की थी. इसी वजह से उनको संसद भवन के पास ही दफनाने का फ़ैसला हुआ था."
अब ख़ालिदा ज़िया की पार्टी बीएनपी ने उनको भी ज़ियाउर रहमान की क़ब्र के पास ही दफनाने का फ़ैसला किया है. ख़ालिदा को राजकीय सम्मान के साथ दफनाया गया है.
लंबे समय से इलाजरत ख़ालिदा का मंगलवार को ढाका के एक अस्पताल में निधन हो गया था.

इमेज स्रोत, BNP
इमेज कैप्शन, ख़ालिदा ज़िया को राजकीय सम्मान के साथ दफनाया गया है
ज़ियाउर रहमान का अंतिम संस्कार
तत्कालीन राष्ट्रपति जियाउर रहमान अपनी पार्टी के स्थानीय नेताओं को मतभेदों को सुलझाने के लिए 29 मई, 1981 को दो दिन के दौरे पर चटगांव गए थे.
उनके साथ रहे पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं से अलग-अलग मौक़े पर मिले ब्यौरे के मुताबिक़ पहले दिन ज़ियाउर रहमान ने पूरे दिन अलग-अलग बैठक करने के बाद क़रीब आधी रात को सोने गए थे.
इसके कुछ घंटों के भीतर ही सैन्य अधिकारियों के एक गुट ने चटगांव सर्किट हाउस पर धावा बोल कर उन पर गोलियां चला दीं, जिससे मौक़े पर ही रहमान की मौत हो गई. 30 मई की सुबह रेडियो पर पहली बार रहमान के निधन की सूचना प्रसारित की गई.
राष्ट्रपति की हत्या से उपजी परिस्थिति में तत्कालीन उपराष्ट्रपति जस्टिस अब्दुस सत्तार ने अंतरिम राष्ट्रपति के रूप में पदभार संभाला.
उन्होंने 30 मई को दोपहर में रेडियो और टेलीविजन पर राष्ट्र को संबोधित करते हुए ज़ियाउर रहमान की मौत की ख़बर की आधिकारिक घोषणा की.
उधर, हत्या के कुछ घंटों के भीतर ही ज़ियाउर रहमान के शव को गोपनीय तरीक़े से चटगांव के पहाड़ी इलाक़े रंगुनिया ले जाया गया.
उस समय कई अख़बारों में छपी ख़बरों में कहा गया था कि रंगुनिया इलाक़े में एक पहाड़ी की तलहटी में ज़ियाउर रहमान को दफना दिया गया था.
'दैनिक संवाद' ने दो जून, 1981 को छपी अपनी एक रिपोर्ट में प्रत्यक्षदर्शियों को हवाले बताया था कि सेना का एक गुट 30 मई को सुबह आठ से नौ बजे के बीच चटगांव सर्किट हाउस पहुंचा था. वो राष्ट्रपति रहमान समेत तीन लोगों के शवों को एक वाहन में रख कर अज्ञात जगह पर ले गए.

इमेज कैप्शन, जियाउर रहमान की हत्या के बाद जस्टिस अब्दुस सत्तार ने अस्थायी राष्ट्रपति के तौर पर शपथ ली थी
सेना के तत्कालीन मेजर रेजाउल करीम रज़ा इस घटना के बाद 30 मई की सुबह सर्किट हाउस गए थे. उन्होंने भी बीबीसी को इस घटना का ब्यौरा दिया है.
दूसरी ओर तत्कालीन सरकार ने बताया था कि हत्याकांड की जानकारी मिलने के बाद उसी दिन राष्ट्रपति रहमान के शव को ढाका लाने की कोशिश की गई थी.
तत्कालीन प्रधानमंत्री शाह अजीजुर रहमान ने उस समय पत्रकारों को बताया था कि स्थानीय अधिकारियों के साथ सीधा संपर्क नहीं हो पाने के कारण राष्ट्रपति के पार्थिव शरीर को अंतरराष्ट्रीय संगठन रेडक्रॉस के ज़रिए ढाका भेजने का अनुरोध किया गया था.
लेकिन सरकार ने बाद में एक बयान में कहा कि चटगांव छावनी के तत्कालीन जीओसी मेजर जनरल अबुल मंजूर ने इस अनुरोध को ख़ारिज कर दिया था.
'दैनिक संवाद' में 31 मई, 1981 को छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक़, 30 मई को बंगभवन में अस्थायी राष्ट्रपति जस्टिस अब्दुस सत्तार के मंत्रिमंडल की पहली औपचारिक बैठक हुई थी. उसमें एक शोक प्रस्ताव पारित किया था.
उसी दिन ढाका में अब्दुस सत्तार ने कहा था, "हमने रेडक्रॉस के ज़रिए चटगांव से राष्ट्रपति का पार्थिव शरीर लाने के कई प्रयास किए. लेकिन उन लोगों ने कोई जवाब नहीं दिया. इसी वजह से हमने शव की ग़ैर-मौजूदगी में ही जनाज़े की नमाज़ अदा की.''
लेकिन 31 मई को तख्तापलट में शामिल सैनिकों और अधिकारियों के बीच मतभेद उभर आए. कई लोगों ने तख्तापलट की साज़िश रचने वालों का साथ छोड़ कर अंतरिम राष्ट्रपति अब्दुस सत्तार की सरकार के प्रति वफ़ादारी जताना शुरू कर दिया. इसी दौरान सरकार ने सेना के विद्रोही अधिकारियों और जवानों को आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया.
तेज़ी से बदलते घटनाक्रम के दौरान मेजर जनरल मंज़ूर और कर्नल मतिउर रहमान सहित कई तख्तापलट अधिकारी 31 मई की रात को चटगांव छावनी से भाग गए.
मेजर जनरल मंजूर के पलायन के बाद चटगांव की सैन्य छावनी दोबारा सरकार के नियंत्रण में आ गई. इसके बाद पुलिस मंजूर को गिरफ्तार कर सैन्य छावनी ले आई. बाद में वो भी गोली लगने से मारे गए.

इमेज कैप्शन, सरकार की पहल पर जियाउर रहमान को राजकीय सम्मान के साथ दफनाया गया था
इसी क़ब्र के बगल में ख़ालिदा ज़िया को दफ़नाया गया
तत्कालीन ब्रिगेडियर हन्नान शाह ने एक जून को ज़ियाउर रहमान के शव को खोज निकाला था.
बाद में बीबीसी बांग्ला के साथ बातचीत में उन्होंने बताया था कि जियाउर रहमान के शव की तलाश के लिए वो लोग कापताई रोड पर बढ़े थे और अनुमान के आधार पर ही नई क़ब्र का पता लगाया गया.
स्थानीय ग्रामीणों ने एक छोटी सी पहाड़ी की ओर इशारा करते हुए ब्रिगेडियर हन्नान और उनकी टीम को बताया था कि सेना के अधिकारियों ने कुछ दिन पहले ही वहाँ एक व्यक्ति को दफनाया है.
गाँव वालों से मिली जानकारी के आधार पर हन्नान शाह सेना के जवानों के साथ वहां पहुंचे. उन्होंने देखा कि वहां एक क़ब्र पर हाल फ़िलहाल की मिट्टी नज़र आ रही है.
वहां खुदाई करने पर राष्ट्रपति जियाउर रहमान और दो अन्य सैन्य अधिकारियों के शव बरामद हुए. वहाँ से रहमान के शव को निकाल कर पहले चटगांव स्थित सैन्य छावनी में ले आया गया और एक जून को उसे हेलिकॉप्टर से राजधानी ढाका पहुंचाया गया.
उसके अगले दिन दो जून को रहमान के शव को सुबह 11 बजे तक संसद भवन में रखा गया ताकि आम लोग उनको श्रद्धांजलि दे सकें.
दो जून के अख़बारों में छपी ख़बरों में न्यूज़ एजेंसी के हवाले बताया गया था, "दिवंगत राष्ट्रपति जियाउर रहमान का नमाज़-ए-जनाज़ा आज यानी मंगलवार (2 जून) को दोपहर साढ़े बारह बजे मानिक मियां एवेन्यू में आयोजित होगी. उसके बाद उनके शव को दोपहर एक बजे नए संसद भवन के पास स्थित झील के किनारे दफनाया जाएगा."
इसके अगले दिन यानी तीन जून को 'दैनिक इत्तेफाक' की रिपोर्ट में बताया गया था, "शेर-ए-बांग्ला नगर पार्क में पूर्व राष्ट्रपति के शव को दफनाने के लिए जगह चुनी गई है. यह पार्क नए संसद भवन और झील के उत्तर और गणभवन के पूर्व की ओर स्थित है"
शोधकर्ता मोहिउद्दीन अहमद ने बीबीसी बांग्ला को बताया है, "उस समय जस्टिस सत्तार की अस्थायी सरकार ने जियाउर रहमान को राजकीय सम्मान के साथ दफनाने के साथ कई फैसले किए थे. दफनाने की जगह भी उन्होंने ही तय की थी."
एबीएम रुहुल अमीन हावलादार बताते हैं, "संसद भवन इलाक़े में जियाउर रहमान को दफनाने के फैसले पर आम राय थी. अवामी लीग के कई तत्कालीन सांसद भी जनाजे और दफ़नाने के दौरान मौक़े पर मौजूद थे. दलगत मतभेदों से ऊपर उठकर समाज के सभी तबके के लोगों ने जनाज़े में हिस्सा लिया था."
अब उसके क़रीब 44 साल बाद ज़ियाउर रहमान की पत्नी ख़ालिदा ज़िया को उसी क़ब्र के बगल में दफनाया गया.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.