दिल्लीः तुर्कमान गेट के पास मस्जिद से सटे अतिक्रमण को हटाने का मामला, स्थानीय लोग क्या बोले?
SOURCE:BBC Hindi
दिल्ली में तुर्कमान गेट स्थित फ़ैज़-ए-इलाही मस्जिद के पास अतिक्रमण को बीती रात ध्वस्त कर दिया गया. वहीं, स्थानीय लोग और मस्जिद समिति का दावा है कि जिस ज़मीन पर कार्रवाई हुई है, वहां कब्रिस्तान हुआ करता था.
दिल्लीः तुर्कमान गेट के पास मस्जिद से सटे अतिक्रमण को हटाने का मामला, स्थानीय लोग क्या बोले?
इमेज कैप्शन, दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश के बाद ये अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की गई है
Author, दिलनवाज़ पाशा
पदनाम, बीबीसी संवाददाता
7 जनवरी 2026
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में तुर्कमान गेट स्थित फ़ैज़-ए-इलाही मस्जिद के पास बने अतिक्रमण को बीती रात ध्वस्त कर दिया गया.
अतिक्रमण हटाने की ये कार्रवाई दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश के बाद की गई है.
इस दौरान स्थानीय लोगों और पुलिस के बीच झड़प भी हुई और पुलिस को आंसू गैस का इस्तेमाल करना पड़ा.
दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी निधिन वलसन ने मीडिया से कहा, "क़रीब 25-30 लोगों ने पुलिस टीम पर पथराव किया जिसमें पांच पुलिसकर्मियों को मामूली चोट लगी है. स्थिति नियंत्रण में करने के लिए हमें आंसू गैस का इस्तेमाल करना पड़ा. यहां एक बैंक्वेट हॉल और डिस्पेंसरी थी जिसे तोड़ा गया है. ये कार्रवाई रात में की गई है ताक़ि इससे स्थानीय लोगों को परेशानी ना हो."
उन्होंने यह भी कहा है कि जिन लोगों ने पत्थरबाज़ी की है उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाएगी. पुलिस का कहना है कि हालात शांतिपूर्ण बने हुए हैं.
मस्जिद के पास बने कथित अवैध हिस्से को हटाने के लिए बीती रात एमसीडी की टीम तीस से अधिक बुलडोज़र और ट्रक लेकर मौक़े पर पहुंची थी.
इस मुद्दे पर मंगलवार को दिल्ली हाई कोर्ट में सुनवाई भी हुई और अब अगली सुनवाई 22 अप्रैल को होगी.
मस्जिद समिति को एमसीडी की कार्रवाई रोकने के लिए अदालत से राहत नहीं मिल सकी थी.
दिल्ली हाई कोर्ट का आदेश
इमेज कैप्शन, हाई कोर्ट ने नवंबर में मस्जिद के पास एक हिस्से को अवैध माना था और इसे तीन महीने के भीतर हटाने का आदेश दिया था
बीते 12 नवंबर में दिल्ली हाई कोर्ट ने मस्जिद के पास बने हिस्से को अवैध मानते हुए दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) को अतिक्रमण हटाने के लिए तीन महीने का वक़्त दिया था.
हाई कोर्ट ने ये आदेश सेव इंडिया फ़ाउंडेशन की याचिका पर दिया था. इस याचिका में मस्जिद के पास अतिक्रमण का दावा किया गया था.
आदेश के मुताबिक़, मस्जिद के पास क़रीब 39 हज़ार वर्गमीटर क्षेत्र में अवैध अतिक्रमण था.
हालांकि, मस्जिद समिति इस ज़मीन पर अपना हक़ होने का दावा कर रही थी और इस आदेश के ख़िलाफ़ दिल्ली हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की गई थी.
मस्जिद समिति से जुड़े जावेद ख़ान ने मंगलवार शाम बीबीसी से कहा था, "प्रशासन जिसे अपनी जगह बता रहा है वहां पहले क़ब्रिस्तान था. हम ज़मीन से जुड़े दस्तावेज़ अदालत में पेश करेंगे."
हालांकि उन्होंने ये भी कहा था, "इस मामले में एकतरफ़ा सुनवाई हो रही है और हमारे पक्ष को सुना नहीं जा रहा है. यदि अदालत हमारे ख़िलाफ़ फ़ैसला देती है तो हम उसे उच्चतम न्यायालय में चुनौती देंगे."
अदालती कार्रवाई के बीच अतिक्रमण का हिस्सा बीती रात हटा दिया गया है.
एमसीडी ने अवैध घोषित किया था निर्माण
इमेज कैप्शन, एमसीडी ने 22 दिसंबर को मस्जिद समिति को जारी एक नोटिस में बताया था कि 0.195 एकड़ ज़मीन को छोड़कर बाक़ी ज़मीन भारत सरकार के अधीन है
दिसंबर में एमसीडी ने 0.195 एकड़ क्षेत्र में बनी फ़ैज-ए-इलाही मस्जिद के अलावा मस्जिद के पास बने बाक़ी निर्माण को अवैध घोषित किया था.
एमसीडी के मुताबिक़, दिल्ली वक़्फ़ बोर्ड या मस्जिद की प्रबंधन समिति 0.195 एकड़ के अलावा बाक़ी ज़मीन के मालिकाना हक़ से जुड़े दस्तावेज़ नहीं दे सके थे.
जिस हिस्से को अतिक्रमण माना गया है उसमें एक डिस्पेंसरी बनी थी और एक बारात घर चल रहा था.
हालांकि, मस्जिद समिति ने हाल के दिनों में बारात घर और डिस्पेंसरी को बंद कर दिया था.
चार जनवरी को भी एमसीडी के अधिकारियों ने मौक़ा मुआयना किया था और अतिक्रमण वाले हिस्से की निशानदेही की थी.
एमसीडी ने 22 दिसंबर को मस्जिद समिति को जारी एक नोटिस में बताया था कि 0.195 एकड़ ज़मीन को छोड़कर बाक़ी ज़मीन भारत सरकार के अधीन है और इस पर बना निर्माण अवैध है.
एमसीडी ने मस्जिद समिति को ज़मीन पर मालिक़ाना हक़ से जुड़े दस्तावेज़ पेश करने के लिए सुनवाई का मौक़ा भी दिया था.
एमसीडी के कमिश्नर ने 22 दिसंबर के अपने आदेश में कहा है कि मस्जिद समिति और वक़्फ़ बोर्ड के पास 1940 में बनी डीड के तहत मिली 0.195 एकड़ ज़मीन के अलावा बाक़ी ज़मीन पर मालिकाना हक़ नहीं है.
आदेश में यह भी कहा गया था कि इस ज़मीन पर बनी मस्जिद के अलावा बाक़ी हिस्सा अतिक्रमण है और उसे हटाया जाना ज़रूरी है.
दिल्ली हाई कोर्ट ने जारी किए नोटिस
मस्जिद समिति ने एमसीडी के इसी आदेश के ख़िलाफ़ हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की थी जिस पर तुरंत राहत नहीं मिल सकी थी.
मस्जिद की प्रबंधन समिति ने एमसीडी के अतिक्रमण हटाने के नोटिस के ख़िलाफ़ दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी जिस पर मंगलवार को सुनवाई हुई.
न्यायमूर्ति अमित बंसल ने मस्जिद सैयद फ़ैज़ इलाही की प्रबंध समिति की याचिका पर नगर निगम (एमसीडी), दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए), शहरी विकास मंत्रालय के भूमि एवं विकास कार्यालय), लोक निर्माण विभाग और दिल्ली वक्फ बोर्ड को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. इस मामले में अगली सुनवाई अब 22 अप्रैल को होगी.
मस्जिद की प्रबंधन समिति ने अपनी याचिका में कहा है कि ये ज़मीन वक़्फ़ संपत्ति है और इस से जुड़े किसी भी विवाद पर निर्णय करने का अधिकार वक़्फ़ ट्राइब्युनल का है.
समिति ने यह दावा भी किया है कि वह इस वक़्फ़ ज़मीन के इस्तेमाल के लिए वक़्फ़ बोर्ड को किराया दे रही थी.
क्या कहना है स्थानीय लोगों का?
इमेज कैप्शन, स्थानीय लोगों का दावा है कि जिस जगह पर निर्माण अवैध बताया जा रहा है वहां क़ब्रिस्तान था.
मस्जिद समिति से जुड़े लोगों और स्थानीय लोगों का दावा है कि जिस जगह पर निर्माण अवैध बताया जा रहा है वहां क़ब्रिस्तान था.
मस्जिद समिति से जुड़े 72 वर्षीय नज़ीमुद्दीन चौधरी कहते हैं, "जहां ये अवैध अतिक्रमण बताया जा रहा है वहां कभी क़ब्रिस्तान हुआ करता था. ये मस्जिद क़रीब दो-ढाई सौ साल पुरानी है. अब पुरानी मस्जिद की जगह नई मस्जिद है."
नज़ीमुद्दीन चौधरी कहते हैं, "जो रिकॉर्ड हमें चाहिए वो फ़ाइलें ही ग़ायब हैं. 1940 में जो डीड बनी थी उसे ही अंतिम दस्तावेज़ माना जा रहा है. आज एमसीडी कह रही है कि यह ज़मीन हमारी है, अगर ज़मीन एमसीडी की है तो एमसीडी उसके दस्तावेज़ अदालत में दिखाए."
नज़ीमुद्दीन कहते हैं, "आज अगर यहां खुदाई करवाई जाएगी तो नीचे दरग़ाह और क़ब्रे निकलेंगी. हमारा सवाल यह है कि यहां क़ब्रे हैं, ज़मीन के नीचे दरग़ाह है, वह ज़मीन एमसीडी या भारत सरकार की कैसे हो गई?"
तुर्कमान गेट इलाक़े में ही रहने वाले एक और व्यक्ति मोहम्मद क़ासिम दावा करते हैं कि दरगाह के पास एक अखाड़ा भी था जिसमें उन्होंने बचपन में पहलवानी की है.
क़ासिम कहते हैं, "यहां क़ब्रें थीं, अखाड़ा था, मैंने और दिल्ली के कई पहलवानों ने यहीं बचपन में पहलवानी की है."
यहां कई लोग 1976 में आपातकाल के दौरान की गई ध्वस्तीकरण की कार्रवाई को याद करते हैं. 1976 में तुर्कमान गेट के पास कथित अवैध बस्तियों को हटाया गया था और विरोध कर रहे लोगों पर पुलिस ने गोली भी चलाई थी, इस घटना में कई लोगों की मौत हुई थी.
70 वर्षीय नसीरुद्दीन एक जगह को दिखाते हुए कहते हैं, "1976 में जब बुलडोज़र चला था तब दरगाह को तोड़ दिया गया था. यहां कई क़ब्रें थीं. वो सब नीचे दफ़न हो गया था."
एक और बुज़ुर्ग दिलशाद कहते हैं, "हमारा जन्म यहीं हुआ है. जहां आज ये बारात घर है वहां क़ब्रिस्तान हुआ करता था. सैकड़ों साल से ये मस्जिद है, ये क़ब्रिस्तान था, अब ये जगह एमसीडी या डीडीए की कैसे हो गई?"
70 साल के मोहम्मद दीन 1976 की घटना को याद करते हुए कहते हैं, "मैं तब इसी मस्जिद में नमाज़ पढ़ रहा था जब बुलडोज़र चला था. मुझे भी जेल भेज दिया गया था. मुसलमानों के साथ पहले भी यही हुआ है और आगे भी यही होगा."
मस्जिद समिति का यह भी दावा है कि अदालत का आदेश आने से पहले कभी भी एमसीडी या किसी और सरकारी विभाग ने किसी तरह का नोटिस ज़मीन को लेकर नहीं दिया.
मस्जिद की प्रबंधन समिति से जुड़े जावेद ख़ान कहते हैं, "12 नवंबर को अदालत का आदेश आया इस जगह को लेकर, उससे पहले कभी भी किसी भी सरकारी विभाग ने हमसे कोई संपर्क नहीं किया. एक साज़िश के तहत याचिका दायर की गई और मुसलमानों की इस जगह को निशाना बनाया गया."
मस्जिद समिति का कहना है कि वह इस कार्रवाई के ख़िलाफ़ अदालत में अपना पक्ष रखेगी.
जावेद ख़ान कहते हैं, "हमने बाबरी मस्जिद का फ़ैसला माना था, हम इस मामले में भी अदालत का जो भी फ़ैसला आएगा उसे मानेंगे. लेकिन हमारा कहना ये है कि कम से कम हमें अपना पक्ष रखने का मौक़ा तो दिया जाए. अगर ज़रूरत होगी तो हम सुप्रीम कोर्ट भी जाएंगे. हम इस फ़ैसले को अदालत में चुनौती देंगे, सड़क पर नहीं."
बीबीसी के लिए कलेक्टिवन्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.