कॉमेडियन प्रताप फौजदार बोले-हंसी का भी राजनीतिकरण होने लगा:स्टैंड-अप कॉमेडी के नाम पर अश्लीलता परोसी जा रही, हास्य में फूहड़ता की जगह नहीं
मशहूर हास्य कवि और कॉमेडियन प्रताप फौजदार नए साल के एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए कोटा पहुंचे। यहां मीडिया से बातचीत में उन्होंने आज की कॉमेडी की दुनिया पर खरी-खरी बातें कीं। फौजदार ने कहा कि कॉमेडी का पुराना स्वरूप अब बदल चुका है, जहां हास्य की जगह फूहड़ता और अश्लीलता ने ले ली है। वे खुद को हास्य कवि बताते हुए बोले, "मैं वीर रस की कविताएं भी गाता था, लेकिन अब कॉमेडी में लडकपन और वल्गर बातें आम हो गई हैं, जिससे अच्छे लोगों का मोहभंग हो रहा है।" फौजदार ने चिंता जताते हुए कहा कि कॉमेडी कभी खत्म नहीं हो सकती, क्योंकि यह हजारों साल पुरानी है। लेकिन इसके बदले हुए रूप पर लगाम लगाने की जरूरत है। उन्होंने जोर देकर कहा, "आज हर कोई डिप्रेशन से जूझ रहा है- छात्र, किसान, नौकरीपेशा लोग और यहां तक कि नेता भी। ऐसे में हंसने-हंसाने की जरूरत सबको है, लेकिन फूहड़ता की कतई नहीं। कॉमेडी को सुधारने का वक्त आ गया है।" उन्होंने ये भी कहा कि आज हंसी का भी राजनीतिकरण हो गया है। हम एक दूसरे राजनीतिक गुट पर कोई पंच नहीं मार सकते। एक दूसरे राजनीतिक गुट के पंच पर इधर का आदमी नहीं हंसता है। जबकि हंसी तो उन्मुक्त है। बहुत सोच समझकर पंच देने पड़ते है।
कॉमेडियन प्रताप फौजदार नए साल के प्रोग्राम में भाग लेने के लिए कोटा पहुंचे। इस दौरान उन्होंने मीडिया से बात करते हुए प्रताप ने कहा कि आज के समय में कॉमेडी का स्वरूप बदल गया है। मैं तो हास्य कवि हूं, वीर रस की कविताएं भी गाता था। हास्य का जो स्वरूप पहले था उसकी जगह अब फूहड़ता और अश्लीलता ने ले ली है। इससे लोगों का हास्य प्रोग्रामों से मन हटा है लेकिन आज हंसने हंसाने की जरूरत सभी को है। उन्होंने कहा कि कॉमेडी का स्वरूप बदल गया है और इसकी वजह से अच्छे लोगों का मोह कॉमेडी से घटा है। आज की कॉमेडी में लडकपन दिखता है। कॉमेडी के नाम पर वल्गर बातें हो रही है। इसको सुधारना चाहिए। कॉमेडी खत्म नहीं हो सकती, ये तो हजारों सालों से है। लेकिन आज हमे जरूरत है कि इसका जो स्वरूप बदला है उस पर लगाम लगे। हंसने हंसाने की सबको जरूरत है। आज हर कोई किसी न किसी तरह से डिप्रेशन से जूझ रहा है। स्टूडेंट, किसान, नौकरीपेशा, नेता सभी तो डिप्रेशन में है, इस डिप्रेशन को दूर करने के लिए हंसी की जरूरत है कॉमेडी की जरूरत है। लेकिन फूहड़ता की जरूरत नहीं है। उन्होंने ये भी कहा कि आज हंसी का भी राजनीतिकरण हो गया है। हम एक दूसरे राजनीतिक गुट पर कोई पंच नहीं मार सकते। एक दूसरे राजनीतिक गुट के पंच पर इधर का आदमी नहीं हंसता है। जबकि हंसी तो उन्मुक्त है। बहुत सोच समझकर पंच देने पड़ते है।