मुंबई अंडरवर्ल्ड के माफ़िया डॉन और उनके शूटरों की कहानी- विवेचना
विवेचना में क़िस्से उन ख़तरनाक हत्यारों के, जिनका इस्तेमाल करके मुंबई अंडरवर्ल्ड के माफ़िया डॉन अपने ख़ौफ़ का साम्राज्य चलाते रहे.
मुंबई अंडरवर्ल्ड के माफ़िया डॉन और उनके शूटरों की कहानी- विवेचना

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इमेज कैप्शन, छोटा शकील (बाएं) और छोटा राजन (दाएं)
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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी हिंदी
- 4 जनवरी 2026
किस्सा मशहूर है कि एक बार माफ़िया डॉन दाऊद इब्राहिम का दाहिना हाथ कहे जाने वाले छोटा शकील ने सादिक़ जलावार से कहा, "अपने बहनोई को जान से मार दो, फिर मैं समझूंगा कि तुममें कोई ख़ास बात है." यह सुनते ही सादिक़ के पैरों तले ज़मीन खिसक गई. उसे अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ, उसका चेहरा पीला पड़ गया और उसके हाथ कांपने लगे.
सादिक़ अपनी बहन को बहुत प्यार करता था, उसके पति का नाम ज़ुल्फ़िकार था. छोटा शकील ने सादिक़ से कहा कि वह उसे तभी फ़ोन करे जब उसका बहनोई ज़ुल्फ़िकार इस दुनिया से जा चुका हो.
सादिक़ ने मेज़ पर रखे हुए एक गिलास से पानी का एक घूंट लिया और शकील से कहा कि काम हो जाएगा, लेकिन शकील सादिक़ का पूरा इम्तेहान लेना चाहता था और उसको कोई रियायत नहीं देना चाहता था.
एस हुसैन ज़ैदी अपनी किताब 'द डेंजरस डज़ेन, हिटमेन ऑफ़ मुंबई अंडरवर्ल्ड' में लिखते हैं, "शकील ने सादिक़ से कहा, 'मैं नहीं चाहता कि तुम इसमें गन का इस्तेमाल करो.'
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सादिक़ ने कुछ ही समय पहले अरुण गवली का गैंग छोड़ा था और हर कीमत पर छोटा शकील का विश्वास जीतना चाहता था, चाहे उसे इसकी क़ीमत अपनी बहन को विधवा बनाकर ही क्यों न चुकानी पड़े. एक दिन उसने ज़ुल्फ़िकार को एक हाथ से गले लगाया और अपना दूसरा हाथ अपनी पीठ के पीछे रखा.
उसने कहा, 'भाईजान, मुझे माफ़ कर देना' और जुल्फ़िकार पर चाकू से पांच वार किए. उसने अपनी बहन के घर की तरफ़ आख़िरी बार देखा. अपनी मोटर साइकिल उठाई और वहां से चला गया. फिर उसने शकील को फ़ोन कर कहा कि काम हो गया है.
शकील ये सुनकर दंग रह गया. वह उम्मीद कर रहा था कि सादिक़ उसे फ़ोन कर कहेगा कि यह उसके बस की बात नहीं है और उसे कोई दूसरा काम दिया जाए. उस दिन से सादिक़ जलावार को 'सादिक़ कालिया' कहा जाने लगा. इस वारदात के बाद छोटा शकील ने उसे मिलने के लिए दुबई बुलवाया.

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सादिक़ कालिया का एनकाउंटर
छोटा शकील ने सादिक़ की मुलाकात एक और गैंगस्टर सलीम चिकना से करवाई. चिकना को मोटरसाइकिल चलाने में महारत हासिल थी. उन दोनों ने मिलकर 1990 के दशक के मध्य में छोटा राजन के गैंग का मुंबई में जीना मुहाल कर दिया. मुंबई पुलिस का अंदाज़ा है कि इन दोनों ने शकील के कहने पर बीस से ज़्यादा लोगों को मारा.
लेकिन वह छोटा शकील का दिया एक काम पूरा नहीं कर पाया. वह था अपने पुराने डॉन अरुण गवली की हत्या, जिसने राजनीति में हाथ आज़माना शुरू किया था.
हुसैन ज़ैदी लिखते हैं, "सादिक़ को जानकारी थी कि गवली पुणे से मुंबई आकर एक जनसभा को संबोधित करने वाला है. वह उस सभा में जाकर उसके समर्थकों के सामने उसे गोली मारने वाला था लेकिन गवली को इसकी भनक लग गई और उसने वह सभा रद्द कर दी."

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इमेज कैप्शन, अरुण गवली बीते साल 18 वर्ष तक सज़ा काटने के बाद जेल से बाहर आए थे
सादिक़ कालिया ने उसका घंटों इंतज़ार किया लेकिन गवली वहां नहीं पहुंचा. पुलिस के हलकों में सादिक का नाम 'भूत' रखा गया था क्योंकि उसे भूत की तरह ग़ायब हो जाने में महारत थी. दूसरा, उसकी काली चमड़ी होने के कारण उसे अंधेरे में छिपने में मदद मिलती थी.
पुलिस कालिया को तो नहीं पकड़ पाई लेकिन उसका पेजर नंबर किसी तरह पुलिस के हाथ लग गया. इस नंबर की मदद से मुंबई पुलिस ने पहले सलीम चिकना को पकड़ा और फिर उसकी मदद से 12 दिसंबर, 1997 को दादर के फूल बाज़ार में सादिक़ कालिया को घेर लिया. पुलिस की तरफ़ से चली सैकड़ों गोलियों के सामने कालिया के लिए कोई मौका नहीं था.
बाद में सब-इंस्पेक्टर दया नायक ने 'मेंस वर्ल्ड' की मंजुला सेन को दिए इंटरव्यू में बताया, "मेरी सबसे बड़ी कामयाबी थी जब मैंने छोटा शकील के बेस्ट शूटरों में से एक, सादिक़ कालिया को मारा. हमने उसे दादर फूल मार्केट में घेर लिया. उसने मेरी तरफ़ छह गोलियां चलाईं. मेरी बाईं जांघ में गोली लगी लेकिन हम उसे न्यूट्रलाइज़ करने में कामयाब हो गए."

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इमेज कैप्शन, मुंबई पुलिस के एनकाउंटर स्पेशलिस्ट माने जाने वाले दया नायक
रेड्डी की फ़ेवरेट ड्रिंक
अब ज़िक्र एक और हिटमैन वेंकटेश बग्गा रेड्डी उर्फ़ बाबा रेड्डी का. एक बार बाबा रेड्डी को गिरफ़्तार करने के बाद और काफ़ी देर तक थर्ड डिग्री ट्रीटमेंट देने के बाद भी पुलिस उससे कुछ भी नहीं उगलवा पाई. एक कॉन्सटेबल ने बाहर आकर अपने अफ़सर से पूछा, "साहब वह कह रहा है कि अगर उसे उसकी फ़ेवरेट ड्रिंक की एक बोतल दे दी जाए तो वह हमारे सवालों का जवाब देना शुरू कर देगा."
अफ़सर ने झल्ला कर कहा, "क्या तुम पागल हो गए हो. हम उसे जेल में शराब कैसे दे सकते हैं ?"
सिपाही का जवाब सुन अफ़सर सन्न रह गया, "साहब, वह शराब नहीं ख़ून की एक बोतल माँग रहा है."
जैसे ही सिपाहियों ने उसे पास के बूचड़ख़ाने से बकरे के ख़ून की बोतल लाकर दी, वह हर सवाल का जवाब देने लगा.
हुसैन ज़ैदी लिखते हैं, "28 साल की उम्र में बग्गा मुंबई अंडरवर्ल्ड के इतिहास का सबसे रहस्यमय चरित्र था. एक और ख़ास बात थी कि वह सिर्फ़ ग़ैर-हिंदुओं को ही अपना शिकार बनाता था. हैदराबाद के पास मुशीराबाद के रहने वाले बग्गा ने कक्षा नौ के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी."
"सन 1989 में बग्गा मुंबई आ गया था और उसने एक बार में बाउंसर के तौर पर काम करना शुरू कर दिया था. फिर उसने छोटा राजन गैंग के लिए काम करना शुरू कर दिया था. वह लोग इस बात से प्रभावित थे कि उसमें अपने जैसे एक दर्जन लोगों को एक साथ पीटने की क्षमता थी. जल्द ही वह मोटी फ़ीस लेकर हत्या करने लगा था."
उस ज़माने में उसे इस काम के लिए तीस से पचास हज़ार रुपये दिए जाते थे. बग्गा रेड्डी का एक महिला से इश्क़ हो गया.
ज़ैदी उसके एक प्रेम प्रसंग के बारे में लिखते हैं, "बग्गा को पता चला कि उस महिला का नाम शहनाज़ है और वह मुसलमान है. उसने उस महिला से शादी करने की इच्छा प्रकट की लेकिन महिला ने एक शर्त रखी कि उसे शादी से पहले इस्लाम धर्म अपनाना होगा. मुसलमानों से नफ़रत करने वाला बग्गा उस महिला के प्रेम में इतना पागल था कि वह मुसलमान बनने के लिए तैयार हो गया और उसने अपना नया नाम अज़ीज़ रेड्डी रख लिया. शादी होते ही बग्गा की क्रूरता में कमी आने लगी. 26 जुलाई, 1998 को एक टिप ऑफ़ पर मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच ने उस गिरफ़्तार कर लिया."
ज़मानत पर रिहा होने के बाद वह एक नकली पासपोर्ट पर मलेशिया चला गया जहाँ उसकी मुलाकात छोटा राजन से हुई.

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इमेज कैप्शन, अंडरवर्ल्ड का कुख्यात शूटर बग्गा रेड्डी
बग्गा रेड्डी का अंत
फिर वह इंडोनेशिया चला गया जहां राजन ने उसे ड्रग्स बनाने वाली इकाई का इंचार्ज बना दिया. बग्गा दिसंबर, 2002 में भारत लौटा. उसे पता था कि दाऊद इब्राहिम के लोग उसे मारने की फ़िराक में हैं. पहले उसने बनारस को अपना अड्डा बनाया और फिर वह हैदराबाद चला गया. हैदराबाद में वह हथियार सप्लायर बन गया और अपराधी गैंगों को अवैध हथियार सप्लाई करने लगा.
उसके पास दक्षिण भारत में नलगोंडा ज़िले में 40 एकड़ ज़मीन थी. बग्गा की ख़ास बात ये थी कि वह अपहरण की फ़िरौती चेक से वसूल करता था. मई 2008 में पुलिस को ख़बर मिली कि बग्गा जुबिली हिल में आने वाला है. टास्क फ़ोर्स के कमांडोज़ ने उसके आने से पहले पोज़ीशन ले ली. सड़कें साफ़ करा दी गईं और किसी वाहन को वहां घुसने नहीं दिया गया. जब बग्गा एक कार से वहाँ पहुंचा तो पुलिस ने कार को घेर लिया.
बाद में हैदराबाद के पुलिस आयुक्त बी प्रसाद राव ने एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में बताया, "हमें पता चला कि बग्गा अपने दो साथियों के साथ जुबिली हिल में पैसे की उगाही करने के लिए आने वाला है. हमने दो घंटे तक उस इलाके की तलाशी ली. रात सवा 11 बजे हमने उसकी कार को बीएन रेड्डी नगर जाने वाली रोड नंबर 46 पर इंटरसेप्ट किया.
जब पुलिस दल उसकी तरफ़ बढ़ा तो उन लोगों ने भागने की कोशिश की. जब पुलिस ने उन्हें आत्मसमर्पण करने के लिए कहा तो रेड्डी ने 9 एमएम की पिस्टल निकाल ली और पुलिस पर फ़ायर करने लगा. पुलिस ने फ़ायर का जवाब फ़ायर से दिया. रेड्डी को गोलियां लगी और वह वहीं गिर पड़ा. उसके दोनों साथी वहां से भागने में कामयाब हो गए.

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इमेज कैप्शन, हैदराबाद के तत्कालीन पुलिस आयुक्त बी प्रसाद राव
जब डीसीपी की आंखों पर पट्टी बांधी गई
25 अगस्त, 1994 को करीब 10 बजे बांद्रा के व्यस्त हिल रोड की एक हाउसिंग सोसाइटी से सफ़ेद रंग की एम्बेसेडर कार बाहर निकली. अचानक न जाने कहां से दो लोग प्रकट हुए और उन्होंने एके-56 राइफ़ल से कार पर गोलियों की बौछार कर दी. अगली सीट पर बैठे पुलिस गार्ड ने अपनी स्टेन गन से गोलियों का जवाब दिया लेकिन हमलावरों ने उसे भी निशाने पर लेकर उसे निष्क्रिय कर दिया.
पिछली सीट पर बैठे बीजेपी के नगर अध्यक्ष रामदास नायक की वहीं मृत्यु हो गई. पूरी मुंबई की पुलिस हत्यारे की तलाश में जुट गई. तभी मुंबई पुलिस के डीसीपी राकेश मारिया के पास एक फ़ोन आया.
राकेश मारिया अपनी आत्मकथा 'लेट मी से इट नाउ' में लिखते हैं, फ़ोन करने वाले ने मुझसे पूछा, "साहब, क्या आप रामदास नायक हत्या केस के बारे में जानकारी चाहते हैं ? मैंने तुरंत कहा, 'हाँ' . उसने कहा, 'इसके लिए आपको मुझसे मिलने बाहर आना पड़ेगा.' मैंने पूछा, 'कहां?' उसने कहा मैं आपको लेने के लिए कार भेजूँगा. पहले मुझे लगा कि ये एक चाल हो सकती है. उस व्यक्ति ने कहा कि ठीक 2 बजे मेरे दफ़्तर के सामने एक कार मुझे पिक करेगी. थोड़ी देर में काले शीशों वाली सफ़ेद मारुति वैन मेरे सामने आकर रुकी. उसके नंबर प्लेट पर कीचड़ लगा हुआ था."
मारिया लिखते हैं, "जैसे ही मैं कार में बैठा, कार में बैठे लोगों ने मेरी आंखों पर पट्टी बांध दी. 15 मिनट ड्राइव करने के बाद कार एक जगह जाकर रुक गई. मैं एक एयरकंडीशंड कमरे में दाख़िल हुआ. मैंने वह आवाज़ फिर सुनी जिसने मुझसे फ़ोन पर बात की थी. उसने कहा, 'साब, मैं आपको इस तरह यहां लाने के लिए माफ़ी चाहता हूँ.' मैंने कहा, इसकी कोई ज़रूरत नहीं. मुझे बताइए , आप क्या जानते हैं? उसने कहा, क्या आपने फ़िरोज़ कोंकणी का नाम सुना है. मैंने कहा, नहीं, ये कौन है. उसने कहा. यंग हिम्मती लड़का है. इसने ये काम किया है. इसके बाद कार ने मुझे उसी जगह छोड़ दिया जहां से उसने मुझे पिक किया था."

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फ़िरोज़ कोंकणी की गिरफ़्तारी
19 अक्तूबर 1994 को मारिया के पास फिर उसी व्यक्ति का फ़ोन आया. उसने कहा, "आपको फ़िरोज़ कोंकणी चाहिए क्या?' मारिया ने जवाब दिया, 'बिल्कुल.' उसने बताया,'इस समय वह बंगलौर में है. उसको पकड़ने के लिए आपको खुद जाना पड़ेगा.' लेकिन मारिया के सीनियर अफ़सरों ने उन्हें बंगलौर जाने की अनुमति नहीं दी. उनकी जगह उनकी टीम बंगलौर पहुंची. उस व्यक्ति ने मारिया को फ़ोन करके कहा कि कि कोंकणी आज एक फ़िल्म देखने जाएगा. आपको वहीं उसे गिरफ़्तार कर लेना होगा. जब सारी तैयारी हो गई तो उसका फिर फ़ोन आया कि कोंकणी ने फ़िल्म देखने का आइडिया बदल दिया है. अब वह होटल में ही रुककर अपने साथियों के साथ बियर पिएगा."
राकेश मारिया लिखते हैं, "होटल का नाम था- 'ब्लू डायमंड' और फ़िरोज़ कमरा नंबर 206 में ठहरा हुआ था. हमने होटल के मैनेजर को विश्वास में लिया. साढ़े सात बजे रूम सर्विस को कमरा नंबर 206 से चिकन लॉलीपॉप का ऑर्डर मिला. टीम ने तय किया कि वह ट्रॉली में खाना रखकर कमरे में जाएंगे. सब-इंस्पेक्टर वार्पे को वेटर बनाया गया. उन्होंने ट्रॉली में अपनी रिवॉल्वर छुपा दी. कमरे के अंदर वार्पे प्लेट निकालने के लिए झुके और उन्होंने रिवॉल्वर निकाल कर फ़िरोज़ कोकणी के ऊपर तान दी. फिर हमारे दूसरे साथी भी कमरे मे घुस गए और उन्होंने कोंकणी को गिरफ़्तार कर लिया."
कोंकणी को जहाज़ पर बैठाकर मुंबई लाया गया. कोंकणी ने स्वीकार किया कि उसने कुल 21 हत्याएं की हैं लेकिन चार साल बाद 6 मई, 1998 को फ़िरोज़ कोकणी मुंबई पुलिस की गिरफ़्त से भाग निकलने में कामयाब हो गया. उसने नेपाल की सीमा पार की और दुबई पहुंच गया. बाद में पता चला कि सन 2003 में दाऊद के लोगों ने उसकी हत्या कर दी.
हुसैन ज़ैदी का मानना है कि किसी ने उसकी बातचीत टेप कर ली थी, जिसमें वह दाऊद के भाई अनीस इब्राहिम को गाली दे रहा था. यह गलती उसके लिए जानलेवा साबित हुई.
राकेश मारिया ने लिखा, "कोंकणी को अंडरवर्ल्ड में 'डार्लिंग' कहकर पुकारा जाता था. जेल के गार्ड ने मुझे उसके बारे में एक अजीब बात बताई थी जिसको मैं कभी भूल नहीं पाया. जेल में उसकी कोठरी में जब काले चींटे आ जाते थे तो वह उन्हें अपनी उंगलियों से पकड़ कर एक-एक करके उनके पैर तोड़ देता था और उनके पैर रहित शरीर को ज़मीन पर लोटते हुए देखता रहता था."

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मोहम्मद शेख़ 'उस्तरा' की कहानी
इसी तरह की कहानी मोहम्मद हुसैन शेख़ की है जिसे 'उस्तरा' के नाम से पुकारा जाता था. उस्तरा को दाऊद इब्राहिम के दाहिने हाथ छोटा शकील से नफ़रत थी. हालांकि उसे बंदूक चलाने में महारत हासिल थी लेकिन उसका नाम 'उस्तरा' पड़ा रेज़र ब्लेड के इस्तेमाल की वजह से.
पुलिस उसके पीछे इसलिए नहीं पड़ी क्योंकि वह पुलिस को अंडरवर्ल्ड की ख़बरें देने का काम भी करता था.
हुसैन ज़ैदी लिखते हैं, "उस्तरा ने मुझे अपनी आस्तीन में छिपाया हुआ ब्लेड दिखाया. वह शेख़ी बघारता था कि वह तीन सेकेंड से भी कम समय में एक पिस्टल को असेंबेल कर सकता था. उसका पसंदीदा हथियार था 1914 में बना माउज़र. उस्तरा के नज़दीकी लोगों में छह लोग हुआ करते थे. उनमें से हर एक में शारीरिक रूप से कोई न कोई विचित्रता थी. किसी का कोई अतिरिक्त अंग था, किसी की आँखों का रंग अलग-अलग था, तो किसी का एक कान बड़ा था. उस्तरा का मानना था कि शारीरिक गड़बड़ी वाले शख़्स हमारे तरह का काम करने में सिद्धहस्त होते हैं. "
औरतें उस्तरा की कमज़ोरी थीं. विवाहित होने और कई बच्चों के बाप होने के बावजूद उसके कई महिलाओं से संबंध थे. दाऊद इब्राहिम को इसका अंदाज़ा था इसलिए उसने उस्तरा के जीवन में एक महिला प्लांट करा दी.
हुसैन ज़ैदी लिखते हैं, "एक बार उस महिला ने उस्तरा से अकेले अंगरक्षकों के बिना मिलने का अनुरोध किया. उस्तरा ने उसकी बात मान ली. सन 1998 की एक सुबह जैसे ही उस्तरा उस महिला से मिलकर बाहर निकला छोटा शकील के भेजे छह लोगों ने उसे घेर लिया.
तीन सेकेंड में पिस्टल जोड़ने वाले उस्तरा पर चारों तरफ़ से फ़ायर हुए. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बताया गया कि उसे कुल सत्ताइस गोलियां लगीं थीं.
वह कहा करता था, "मैंने कई लोगों की क़ब्र खुदवाई है. एक दिन कोई मेरा 'खड्डा' भी खोदेगा.' उसकी वह बात सच साबित हुई थी.
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