'हम पूरी तरह भारतीय कैसे दिखें?', एक छात्र की हत्या ने भारत में नस्लवाद पर कैसे ध्यान खींचा
देहरादून में त्रिपुरा के छात्र एंजेल चकमा की हत्या के बाद कई शहरों में विरोध प्रदर्शन हुए. इसके साथ ही इससे एक बार फिर सबका ध्यान उस नस्लवाद की ओर भी गया, जिसका सामना पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों को करना पड़ता है.
'हम पूरी तरह भारतीय कैसे दिखें?', एक छात्र की हत्या ने भारत में नस्लवाद पर कैसे ध्यान खींचा

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इमेज कैप्शन, 17 दिन बाद अस्पताल में इलाज के बाद एंजेल चकमा ने दम तोड़ दिया था
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- Author, अभिषेक डे
- पदनाम, गुवाहाटी, बीबीसी न्यूज़
- 10 जनवरी 2026
हिमालय की घाटी में बसा उत्तराखंड का शहर देहरादून, कुछ हफ़्ते पहले एक ग़लत वजहों से सुर्खियों में आया.
पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा से 1,500 मील से भी ज़्यादा दूरी तय कर दो भाई एंजेल और माइकल चकमा देहरादून आए थे. उनके पिता तरुण चकमा ने बीबीसी को बताया कि 9 दिसंबर को वह बाज़ार गए थे, जहां कुछ लोगों ने उन्हें घेर लिया और कथित तौर पर नस्लीय गालियां दीं.
जब उन्होंने इसका विरोध किया तो उन पर हमला कर दिया गया. माइकल चकमा के सिर पर लोहे के कड़े से वार किया गया, जबकि एंजेल चकमा को चाकू मार दिया गया.
माइकल अब ठीक हो चुके हैं, लेकिन 17 दिन बाद अस्पताल में इलाज के बाद एंजेल चकमा ने दम तोड़ दिया.
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उत्तराखंड की राजधानी देहरादून की पुलिस ने इस मामले में पांच लोगों को गिरफ़्तार किया है.
हालांकि पुलिस का कहना है कि इस हमले की वजह नस्लीय भेदभाव नहीं है, लेकिन चकमा परिवार ने पुलिस के दावे का तीखा विरोध किया है.
देश के अन्य हिस्सों में भेदभाव

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इमेज कैप्शन, एंजेल चकमा की मौत के बाद कई शहरों में विरोध प्रदर्शन हुए
इस घटना के बाद कई शहरों में विरोध प्रदर्शन हुए. इसके साथ ही इससे एक बार फिर सबका ध्यान उस नस्लवाद की ओर भी गया, जिसका सामना पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों को करना पड़ता है, जब वह देश के बड़े शहरों में पढ़ाई या काम के लिए जाते हैं.
उनका कहना है कि अक्सर उनके रूप-रंग का मज़ाक उड़ाया जाता है, उनकी राष्ट्रीयता पर सवाल उठाए जाते हैं और सार्वजनिक जगहों, दफ़्तरों में उन्हें परेशान किया जाता है.
कई लोगों के लिए यह भेदभाव सिर्फ़ गालियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी में मुश्किलें पैदा करता है, जैसे कि वह कहां और कैसे रहते हैं. पूर्वोत्तर के लोगों का कहना है कि मकान मालिक अक्सर उनके रूप-रंग, खाने की आदतों या पहले से बनी उनकी छवि की वजह से उन्हें मकान किराए पर देने से इनकार कर देते हैं.
ऐसे दबावों के चलते बड़े शहरों में पूर्वोत्तर से आए प्रवासी अक्सर कुछ ख़ास मोहल्लों में ही बस जाते हैं. इससे उन्हें सुरक्षा, आपसी सहयोग और सांस्कृतिक अपनापन मिलता है.
हालांकि कई लोग कहते हैं कि भले ही वे दूसरे शहरों में रोज़मर्रा के पूर्वाग्रहों के साथ रहना सीख लेते हैं ताकि देश में कहीं और भी रह सकें, लेकिन एंजेल चकमा की तरह हिंसक वारदातें उन्हें गहराई से झकझोर देती हैं. ऐसी वारदातें अपनी सुरक्षा को लेकर डर और नाज़ुकपन की भावना को और मज़बूत कर देती हैं.

