जयशंकर ढाका जाकर भी बांग्लादेश की अतंरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस से क्यों नहीं मिले
जयशंकर ख़ालिदा ज़िया को श्रद्धांजलि देने ढाका गए थे लेकिन चर्चा इस बात की हो रही है कि उनकी मुलाक़ात बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुखिया मोहम्मद यूनुस से क्यों नहीं हुई.
जयशंकर ढाका जाकर भी बांग्लादेश की अतंरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस से क्यों नहीं मिले

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इमेज कैप्शन, ढाका में ख़ालिदा ज़िया के बेटे तारिक़ रहमान से मिलकर भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने पीएम मोदी का पत्र सौंपा था
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- Author, सजल दास
- पदनाम, बीबीसी बांग्ला
- एक घंटा पहले
बांग्लादेश में बीएनपी अध्यक्ष ख़ालिदा ज़िया को श्रद्धांजलि देने आए भारतीय विदेश मंत्री और अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार के बीच किसी औपचारिक बैठक के न होने को लेकर कई तरह की चर्चाएँ चल रही हैं.
भारत सरकार की ओर से भेजे गए शोक संदेश की भाषा को लेकर भी बातें हो रही हैं.
खालिदा ज़िया के निधन के बाद उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए कई देशों की सरकारों के प्रतिनिधि छोटे दौरे पर बांग्लादेश आए.
भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर के अलावा पाकिस्तान की संसद के स्पीकर सरदार अयाज़ सादिक, भूटान के विदेश मंत्री लेओनपो डी. एन. धुंगेल, नेपाल के विदेश मंत्री बाला नंदा शर्मा, श्रीलंका के विदेश मंत्री विजिता हेराथ और मालदीव के शिक्षा मंत्री अली हैदर अहमद भी बांग्लादेश पहुंचे.
मुख्य सलाहकार के प्रेस विंग और विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता के अनुसार, आए हुए नेताओं में से बांग्लादेश के मुख्य सलाहकार प्रोफेसर मोहम्मद यूनुस की पाकिस्तान की संसद के स्पीकर और नेपाल के विदेश मंत्री के साथ औपचारिक बैठक हुई.
हालांकि भारत, भूटान, श्रीलंका और मालदीव के प्रतिनिधियों के साथ कोई बैठक नहीं हुई. अन्य देशों को लेकर बहुत चर्चा नहीं हुई लेकिन भारतीय विदेश मंत्री से मुलाक़ात नहीं होने को लेकर तरह-तरह के स्पष्टीकरण और विश्लेषण सामने आ रहे हैं.
बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता महबूबुल आलम ने कहा कि भले ही इस छोटे दौरे में भारतीय विदेश मंत्री की मुख्य सलाहकार से मुलाक़ात नहीं हुई लेकिन विधि सलाहकार आसिफ नज़रुल और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के साथ उनकी बैठकें हुईं.

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इमेज कैप्शन, ढाका में ख़ालिदा ज़िया के बेटे तारिक़ रहमान के साथ भारतीय विदेश मंत्री
भविष्य के संबंधों पर नज़र
इस बीच अंतरिम सरकार के विदेश मामलों के सलाहकार तौहीद हुसैन ने कहा कि भारतीय विदेश मंत्री की यात्रा को द्विपक्षीय संबंधों या राजनीतिक दृष्टिकोण से नहीं देखना बेहतर होगा.
उन्होंने खालिदा ज़िया के अंतिम संस्कार में भारतीय विदेश मंत्री की उपस्थिति को "एक सकारात्मक संकेत" बताया लेकिन यह भी जोड़ा कि दोनों देशों के बीच तनावपूर्ण संबंधों में यह यात्रा कितनी राहत लाएगी, यह "समय ही बताएगा."
इसके अलावा, ख़ालिदा ज़िया के निधन पर भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से भेजे गए शोक संदेश में नेतृत्व को लेकर बीएनपी के कार्यवाहक अध्यक्ष तारिक़ रहमान के बयान का भी विस्तार से विश्लेषण किया जा रहा है.
कई अंतरराष्ट्रीय संबंध विशेषज्ञों का मानना है कि बीएनपी अध्यक्ष को श्रद्धांजलि देने के लिए भारत के एक उच्चस्तरीय अधिकारी की यात्रा और भारतीय सरकार का शोक संदेश भविष्य के संबंधों को आगे बढ़ाने को लेकर भारत के रुख़ का स्पष्ट संकेत है.
हालांकि उनका यह भी मानना है कि इससे मौजूदा बांग्लादेश सरकार से भारत की कूटनीतिक दूरी और स्पष्ट हो गई है.
बुधवार को खालिदा ज़िया के जनाज़े और दफ्न के दिन भारत, पाकिस्तान, नेपाल और भूटान के प्रतिनिधियों ने अपनी-अपनी सरकारों की ओर से तारिक़ रहमान को शोक संदेश सौंपे.
इस दौरान विधि सलाहकार आसिफ नज़रुल और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार खलीलुर रहमान को भारतीय विदेश मंत्री से बातचीत करते हुए भी देखा गया.
दूसरी ओर, पाकिस्तान के स्पीकर सरदार अयाज़ सादिक ने बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस से मुलाकात की.

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इमेज कैप्शन, बांग्लादेश की अंतरिम सरकार में विदेश मंत्रालय के सलाहकार तौहीद हुसैन के साथ भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर
बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने क्या कहा?
इसके बाद यह सवाल उठता है कि एस. जयशंकर ने मुख्य सलाहकार से मुलाक़ात क्यों नहीं की.
इस सवाल का जवाब विदेश मामलों के सलाहकार तौहीद हुसैन ने गुरुवार को पत्रकारों को दिया.
उन्होंने कहा कि भारतीय विदेश मंत्री की यात्रा को द्विपक्षीय संबंधों या राजनीतिक दृष्टि से देखना उचित नहीं होगा.
उन्होंने कहा, "भारतीय विदेश मंत्री आए, उनकी यात्रा छोटी थी. लेकिन वे पूरे कार्यक्रम में शामिल हुए और फिर चले गए."
जयशंकर के साथ किसी निजी बैठक के न होने का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा, "हमारी आमने-सामने कोई बातचीत नहीं हुई. ऐसा कोई अवसर नहीं बना. अन्य विदेशी मेहमान भी थे, पाकिस्तान के स्पीकर भी मौजूद थे, उनसे भी उन्होंने हाथ मिलाया. यह एक शिष्टाचार है, जिसे सभी मानते हैं."
उन्होंने कहा, "मेरी उनसे जो बातचीत हुई, वह राजनीतिक नहीं थी. वह पूरी तरह शिष्टाचार के तहत, सबके सामने हुई. इसलिए द्विपक्षीय मुद्दों पर चर्चा का कोई अवसर नहीं था."
बीएनपी अध्यक्ष खालिदा ज़िया के अंतिम संस्कार में राष्ट्रीय संसद भवन के दक्षिण प्लाज़ा में असंख्य लोग शामिल हुए.
बीएनपी के नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ-साथ विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता-कार्यकर्ता और कई देशों की सरकारों के प्रतिनिधि भी श्रद्धांजलि देने पहुंचे.
अंतरराष्ट्रीय संबंध विश्लेषकों का मानना है कि खालिदा ज़िया को श्रद्धांजलि देकर और उनके प्रमुख नेताओं से मुलाक़ात कर कई देशों ने बांग्लादेश के साथ भविष्य के संबंधों को आगे बढ़ाने का कूटनीतिक संदेश दिया है.
पड़ोसी देश भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर की बांग्लादेश यात्रा को विशेष महत्व दिया जा रहा है.
ढाका विश्वविद्यालय की अंतरराष्ट्रीय संबंधों की प्रोफेसर लैइलुफर यासमीन का मानना है कि खालिदा ज़िया के निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का शोक संदेश और भारतीय विदेश मंत्री की यात्रा दोनों देशों के रिश्तों को सुधारने की दिशा में क़दम हैं.
उन्होंने बीबीसी बांग्ला से कहा, "यह इस बात का संकेत है कि भारत ने आखिरकार बांग्लादेश की आंतरिक भावनाओं को समझ लिया है, जिन्हें वह पिछले डेढ़ साल से समझने में चूक रहा था."
हालांकि, यासमीन का मानना है कि मुख्य सलाहकार से मुलाक़ात न होने को नकारात्मक रूप से देखने की कोई वजह नहीं है.

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इमेज कैप्शन, बांग्लादेश की अंतरिम सरकार में विदेश मंत्रालय के सलाहकार तौहिद हुसैन से मिलते जयशंकर
नहीं मिलने का फ़ैसला किसका?
उनका कहना है, "यह अटकलें लगाई जा सकती हैं कि मुलाक़ात क्यों नहीं हुई. शायद समय का मामला रहा हो. इसके अलावा, जयशंकर किससे मिले, उनके पास समय था या नहीं,इसे दोनों पक्षों से देखना होगा."
वहीं, पूर्व राजदूत मुंशी फैज़ अहमद का मानना है कि इस यात्रा से यह और स्पष्ट हो गया है कि भारत के मौजूदा बांग्लादेश सरकार के साथ अच्छे संबंध नहीं हैं.
उनके अनुसार, नई दिल्ली इस यात्रा के ज़रिये यह भी संदेश देना चाहती थी कि भारत बांग्लादेश के साथ अच्छे संबंध चाहता है.
वे मानते हैं कि मुख्य सलाहकार से मुलाक़ात न होने का कारण यह है कि भारत भविष्य की ओर देख रहा है.
मुंशी फैज़ अहमद का यह भी कहना है कि पिछले अनुभवों के आधार पर कोई भी देश द्विपक्षीय संबंधों में अतिरिक्त चर्चा नहीं चाहता.
उन्होंने बीबीसी बांग्ला से कहा, "संभव है कि जयशंकर मिलना नहीं चाहते हों और बांग्लादेश ने भी खास रुचि न दिखाई हो. जो काम करने आए थे, वह करके चले गए. इसमें चिंता की कोई बात नहीं है."
पूर्व राजदूतों और अंतरराष्ट्रीय संबंध विश्लेषकों का मानना है कि बीएनपी अध्यक्ष खालिदा ज़िया के निधन के बाद दक्षिण एशिया के कई देशों के नेताओं की उपस्थिति ने एक बार फिर क्षेत्रीय राजनीति में बांग्लादेश के महत्व को स्पष्ट किया है.
हालांकि उनका यह भी मानना है कि अवामी लीग सरकार के पतन के बाद बांग्लादेश और पड़ोसी भारत के बीच ठंडे पड़े संबंध जल्दी पहले जैसे नहीं होंगे.
विश्लेषकों का कहना है कि खालिदा ज़िया के निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा भेजा गया शोक संदेश भू-राजनीतिक और कूटनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है. उनका मानना है कि इस संदेश के माध्यम से भारत ने द्विपक्षीय संबंधों में एक अहम संकेत दिया है.
कई विश्लेषक जयशंकर की तारिक़ रहमान से मुलाक़ात और मुख्य सलाहकार से प्रत्यक्ष मुलाक़ात न होने को "भविष्य की राजनीति की तैयारी" के रूप में देख रहे हैं.

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इमेज कैप्शन, बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुखिया मोहम्मद यूनुस से मिलते पाकिस्तान की संसद के स्पीकर सादिक़ अयाज़
भारत के लिए बीएनपी ही विकल्प?
पूर्व राजदूत मुंशी फैज़ अहमद का कहना है कि भारत यह मानकर बीएनपी के साथ संबंध बनाने की कोशिश कर रहा है कि आगामी चुनावों में वह सत्ता में आ सकती है.
उन्होंने कहा, "अब उनके पास कोई और विकल्प नहीं है, इस समय बीएनपी ही भारत की नंबर एक पसंद है."
विश्लेषकों का कहना है कि भारत और बीएनपी के बीच लंबे समय से एक तरह की 'दूरी' या 'अविश्वास' रहा है.
हालांकि, खालिदा ज़िया के निधन पर नरेंद्र मोदी की ओर से दिए गए सरकारी और व्यक्तिगत शोक संदेश यह साबित करते हैं कि भारत अब बीएनपी के साथ संबंध सामान्य करने और राजनीतिक संपर्क बढ़ाने में रुचि रखता है.
विश्लेषकों का यह भी मानना है कि भारत ने इस अवसर का उपयोग कर अंतरिम सरकार के साथ अपनी असहजता को कुछ हद तक कम करने की कोशिश की है.
भारतीय सरकार के शोक संदेश में बांग्लादेश और भारत के बीच लंबे समय से चले आ रहे ऐतिहासिक संबंधों का उल्लेख किया गया.
संदेश में बांग्लादेश की स्थिरता और लोकतांत्रिक निरंतरता पर भी जोर दिया गया.
खालिदा ज़िया जैसी वरिष्ठ नेता को सम्मान देकर भारत ने बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति में अपनी भागीदारी और मित्रता का हाथ बढ़ाने का संदेश भी दिया है.
संदेश में कहा गया, "मुझे दृढ़ विश्वास है कि बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी में आपके (तारिक रहमान) सक्षम नेतृत्व में उनके (खालिदा ज़िया) आदर्शों को आगे बढ़ाया जाएगा और यह भारत-बांग्लादेश के गहरे और ऐतिहासिक साझेदारी को और समृद्ध करने का मार्गदर्शन करेगा, एक नई शुरुआत सुनिश्चित करते हुए."
अंतरराष्ट्रीय संबंध विश्लेषक इस हिस्से को विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानते हैं. उनमें से कुछ का कहना है कि मोदी का यह संदेश मूल रूप से "अतीत को भुलाकर भविष्य की ओर देखने" और बांग्लादेश की बदलती राजनीतिक स्थिति में प्रमुख राजनीतिक शक्तियों के साथ काम करने की इच्छा का संकेत है.
हालांकि, ढाका विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय संबंध विभाग की प्रोफेसर लैइलुफर यासमीन इस संदेश को कूटनीतिक दृष्टि से बहुत अलग नहीं मानतीं.
उनका कहना है, "जब किसी भी पार्टी के नेता को संदेश दिया जाता है तो 'नेतृत्व' शब्द का उपयोग किया जाता है. लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि उन्होंने (नरेंद्र मोदी ने) यह कहा है कि बीएनपी चुनाव जीतेगी. इसका इतना सरल अर्थ निकालना सही नहीं होगा."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.