शरीर कर सकता है अपने आप को डिटॉक्स लेकिन आपको करनी होगी ये मदद
इस बात के सबूत बहुत कम हैं कि कई तरह की एनर्जी या प्रोटीन कम करने वाली डिटॉक्स डाइट, शरीर से टॉक्सिन्स निकालती हैं या वज़न पर काबू पाने में मदद करती हैं.
शरीर कर सकता है अपने आप को डिटॉक्स लेकिन आपको करनी होगी ये मदद

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- Author, जोसलीन टिम्परली, मार्था हेनरिक्स, इसाबेल गेरेट्सन, रिचर्ड ग्रे
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
- 7 घंटे पहले
अगर आपने भी त्यौहारों की मौज‑मस्ती में खाने‑पीने में ज़्यादा ही लापरवाही कर दी है, तो अब शायद आप डिटॉक्सिफ़िकेशन (या डिटॉक्स) डाइट अपनाने के बारे में सोच रहे हों. यानी कि कुछ हफ़्तों की डाइट से शरीर से टॉक्सिन्स या हानिकारक तत्वों की सफ़ाई करने का इरादा होगा.
असल में जब इन डाइट्स का प्रचार किया जाता है तब 'टॉक्सिन्स' शब्द का प्रयोग अनिश्चित और अस्पष्ट तरीके से किया जाता है.
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इस लेख में हम बात करेंगे कि आप कैसे अपने शरीर के डिटॉक्सिफ़िकेशन में मदद कर सकते हैं.
फ़ाइबर ज़्यादा खाएं

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ज़्यादातर लोग फ़ाइबर बहुत कम खाते हैं. जिस मात्रा में इन्हें लेने की सलाह दी जाती है, अमेरिका में 97% पुरुष और 90% महिलाएं उतना नहीं ले पाते. असल में, ज़्यादातर अमेरिकी इसकी आधी मात्रा भी नहीं लेते.
फ़ाइबर शरीर को साफ़ करने में मदद करता है, और यही वजह है कि इसके इतने फ़ायदे हैं.
रिसर्च बताती है कि फ़ाइबर चुंबक की तरह काम करता है, टॉक्सिन्स और दूसरे पदार्थों से चिपककर उन्हें शरीर से बाहर निकालने में मदद करता है.

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कुछ अध्ययनों से यह भी पता चला है कि फ़ाइबर कैंसर पैदा करने वाले तत्वों को डिटॉक्स करने और कैंसर कोशिकाओं को बढ़ने से रोकने में भी सीधी मदद कर सकते हैं. हालांकि यह शोध अभी शुरुआती स्तर पर है.
फ़ाइबर किडनी और लिवर की भी रक्षा करता है - ये दोनों ही शरीर से टॉक्सिन्स निकालने के लिए ज़रूरी हैं. यह इन्हें हानिकारक बैक्टीरिया से बचाता है और अच्छे बैक्टीरिया को बढ़ने देता है.
फ़ाइबर की मात्रा बढ़ाने के लिए पौधों से बने खाद्य पदार्थ सबसे अच्छे हैं. सूखे मेवे जैसे खुबानी, हरी पत्तेदार सब्ज़ियां जैसे पालक, दालें और फलियां जैसे छोले, मसूर, सेम में फ़ाइबर बहुत ज़्यादा होता है और दलिया, जई के साथ साबुत गेहूं की ब्रेड या पास्ता में भी.
पानी ज़्यादा पिएं

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पानी शरीर से टॉक्सिन्स निकालने में मदद करता है, क्योंकि यह किडनी और लिवर को अपशिष्ट बाहर करने में सहायता करता है.
उदाहरण के लिए किडनी पानी का इस्तेमाल करके सोडियम और यूरिया जैसे टॉक्सिन्स को बाहर करती है. अगर शरीर में पानी की कमी हो जाए (डिहाइड्रेशन), तो अपशिष्ट जमा होने लगता है. लंबे समय तक हल्का डिहाइड्रेशन भी किडनी को नुक़सान पहुंचा सकता है और सफ़ाई की उसकी क्षमता को कम कर सकता है. पर्याप्त पानी पीने से लंबे समय तक किडनी सुरक्षित रह सकती है. 18 क्लिनिकल ट्रायल्स की एक समीक्षा में पाया गया कि दूसरे फ़ायदों के अलावा, ज़्यादा पानी पीने से किडनी स्टोन का ख़तरा कम हो सकता है.
तो सवाल यह है कि कितना पानी पर्याप्त होता है ताकि आपका शरीर ये ज़रूरी काम कर सके? आठ गिलास (करीब दो लीटर) पानी वाली सलाह पुरानी पड़ चुकी है. यह 1945 की गाइडलाइन पर आधारित थी, जिसमें खाने से मिलने वाले पानी को भी शामिल किया गया था. आज के हिसाब से, ज़्यादातर लोगों के लिए 1.5 से 1.8 लीटर (छह से साढ़े सात गिलास) रोज़ाना पर्याप्त है.
अपने फेफड़ों की मदद करें

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आजकल कई प्रोडक्ट्स दावा करते हैं कि वे आपके फेफड़े साफ़ कर देंगे, कई तो कुछ दिन में ही ऐसा करने का दावा करते हैं. अमेरिकन लंग एसोसिएशन (एएलए) चेतावनी देती है कि ऐसे 'त्वरित समाधान' पर भरोसा न करें, क्योंकि इनमें से कुछ डिटॉक्स उपाय ख़तरनाक भी हो सकते हैं.
अपने फेफड़ों की खुद की सफ़ाई की प्राकृतिक क्षमता को बढ़ाने के कुछ तरीके हैं लेकिन सबसे पहले प्रदूषण से बचें. अगर आप धूम्रपान या वेपिंग (ई-सिगरेट पीना) करते हैं, तो इसे छोड़ना सबसे ज़रूरी काम है. इसके साथ ही परोक्ष धूम्रपान (सेकंडहैंड स्मोक) से भी बचें.
एएलए की सलाह है कि घर के अंदर की हवा जितनी साफ़ हो सके उतनी रखें. इसके लिए ऐसे क्लीनिंग प्रोडक्ट्स या एयर फ्रेशनर से बचें जिनमें वोलाटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड्स (वीओसी) या ख़ुशबू हो. मोमबत्तियां, चिमनी और नैचुरल गैस से भी दूर रहें. हेपा (hepa) वैक्यूम क्लीनर से सफ़ाई करने से धूल और एलर्जी पैदा करने वाले तत्व कम होते हैं. (घर के अंदर के प्रदूषकों को कम करने के सबसे प्रभावी तरीकों के बारे में और पढ़ें)
कार्डियोवैस्कुलर एक्सरसाइज़ भी फेफड़ों की सेहत के लिए अच्छी होती है. इससे वायुमार्ग की सूजन घटती है और सांस लेने वाली मांसपेशियों की ताक़त और सहनशक्ति बढ़ती है. फेफड़ों को सीधे मज़बूत करने के लिए भी एक्सरसाइज़ की जा सकती है, जिसमें कोई फूंक मारकर बजाने वाला वाद्य (बाँसुरी, शहनाई आदि) बजाना शामिल है. (अपने फेफड़ों की स्थिति सुधारने के बारे में और पढ़ें)
मज़े से सोएं

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यह कचरा, अतिरिक्त प्रोटीन और दूसरे अणु, जिनमें अल्ज़ाइमर रोग से जुड़े बीटा एमिलॉइड भी शामिल होते हैं, दिनभर दिमाग़ की कोशिकाओं के काम करने से बनता है और धीरे-धीरे जमा होता है. इसका कुछ हिस्सा टूटकर खून और दिमाग़ के बीच मौजूद सुरक्षा परत से बाहर निकल जाता है, लेकिन बाकी न्यूरॉन्स के बीच फंस जाता है.
हाल की रिसर्च बताती है कि सेरेब्रोस्पाइनल फ्लुइड- वह रंगहीन तरल पदार्थ जो रीढ़ और दिमाग़ की रक्षा करता है - नींद के अलग अलग चरणों में पंप करके बाह्रयकोशिकीय जगहों (extracellular spaces) में भेजा जाता है और ये हानिकारक अणुओं को धोकर बाहर करता है. ख़ासतौर पर हल्की नींद के दौरान क्षणिक उत्तेजनाएं (micro arousals) इस तरल को दिमाग़ के कई हिस्सों में तेज़ी से बहने देते हैं.
इसका असर अगले दिन हमारे दिमाग़ पर पड़ सकता है. रात के इस समायोजन के बिना हमारी सोचने समझने की क्षमता धीमी हो सकती है और निर्णय लेने की शक्ति कमज़ोर पड़ सकती है.

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कुछ शोधकर्ता इस संभावना की भी पड़ताल कर रहे हैं कि क्या नींद की इस सफ़ाई प्रक्रिया को जागते हुए किया जा सकता है. इसके लिए ट्रांसक्रैनियल रेडियोफ्रीक्वेंसी ट्रीटमेंट जैसी तकनीक के साथ प्रयोग किए जा रहे हैं, जिसमें पूरे दिमाग़ में रेडियो तरंगें भेजी जाती हैं.
अन्य विशेषज्ञों का मानना है कि बेहतर होगा हम जीवनशैली पर ध्यान दें ताकि नींद की प्राकृतिक सफ़ाई प्रणाली मज़बूत हो. कुछ अध्ययन बताते हैं कि दाईं करवट सोने से सेरेब्रोस्पाइनल फ्लुइड से टॉक्सिन्स की सफ़ाई बेहतर हो सकती है (हालांकि आम आदमी रात में औसतन 11 बार करवट बदलता है). ज़्यादा शराब पीना नींद पर बुरा असर डालता है जबकि नियमित व्यायाम नींद को बेहतर बनाता है. हालांकि, इस क्षेत्र में शोध अभी शुरुआती दौर में है और ज़्यादातर जानवरों पर हुए हैं. इंसानों को लेकर पुख़्ता जानकारी मिलने तक कोई ठोस सलाह देना जल्दबाज़ी होगी.
फ़िट रहें
व्यायाम से आप शरीर को टॉक्सिन्स से मुक्त करने में मदद कर सकते हैं. लेकिन पसीना बहाने से नहीं.
हॉट योगा, सॉना में बैठना या गर्म स्टूडियो में वर्कआउट करना आजकल काफ़ी लोकप्रिय है, लेकिन वैज्ञानिकों को इस दावे पर शक है कि 'पसीने के साथ टॉक्सिन्स भी निकल जाते हैं'. साउथैम्पटन यूनिवर्सिटी के फिज़ियोलॉजी के प्रोफ़ेसर डेविड फिलिंजेरी ने अक्टूबर 2025 में बीबीसी को बताया था कि उन्हें इस दावे का 'कोई ठोस सबूत' नहीं मिला है. वहीं, रसायनशास्त्री और 'द जॉय ऑफ़ स्वेट' की लेखिका सारा एवरट्स ने इसे 'पूरी तरह बेतुकी बात' बताया.

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अतिरिक्त चर्बी लिवर की सफ़ाई क्षमता को कमज़ोर करती है और शोध से पता चला है कि व्यायाम से इसे कम किया जा सकता है. शराब न पीने पर फ़ैटी लिवर की समस्या से लिवर को लंबे समय तक नुक़सान हो सकता है और उसमें दाग पड़ सकते हैं. ऐसे ही एक मरीज़ पर किए गए अध्ययन से पता चला कि रेज़िस्टेंस ट्रेनिंग और एरोबिक एक्सरसाइज़ से लिवर की चर्बी कम हुई.
किडनी रिसर्च यूके के अनुसार तेज़ चाल से चलना, तैरना और साइकिल चलाना किडनी की सेहत के लिए सबसे अच्छे व्यायामों में से हैं. यहां तक कि बागवानी, घर के काम या लिफ़्ट की बजाय सीढ़ियों से चढ़ना भी मददगार होता है.
लेकिन इन सब उपायों और व्यवहार में बदलाव लाने का सेहत पर असर तभी होता है जब आप लंबे समय तक इन्हें अपनाएं.
उदाहरण के लिए विशेषज्ञ कहते हैं कि 'ड्राई जनवरी' जैसे छोटे‑मोटे बदलाव से कुछ फ़ायदे मिल सकते हैं, लेकिन पूरे साल शराब की तय गाइडलाइन की हद में रहना सेहत के लिए कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण है.
वैज्ञानिकों के अनुसार इसी तरह खाने की आदतों में सबसे स्वस्थ बदलाव 'मेडिटेरेनियन डाइट' को स्थायी रूप से अपनाना है. (लंबे समय तक बेहतर स्वास्थ्य के लिए जीवनशैली में सबसे अच्छे बदलावों के बारे में जानने के लिए यहां पढ़ें)
इसलिए अगर आप इस महीने कोई विज्ञान-सम्मत बदलाव करना चाहते हैं तो ज़रूर करें, लेकिन ध्यान रखें कि असली स्वास्थ्य लाभ पाने के लिए इसे कुछ हफ़्तों से कहीं ज़्यादा समय तक जारी रखना होगा.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.