हनुमानगढ़ में सफदर हाशमी की 46वीं बरसी मनाई:जनवादी लेखक संघ और जन नाट्य मंच ने दी श्रद्धांजलि
हनुमानगढ़ में जनवादी लेखक, नाटककार और रंगकर्मी सफदर हाशमी की 46वीं बरसी मनाई गई। टाउन स्थित जनशक्ति भवन में जनवादी लेखक संघ और जन नाट्य मंच ने एक कार्यक्रम का आयोजन किया। इसमें जिले के कवि, लेखक, गायक, रंगकर्मी और सामाजिक कार्यकर्ता बड़ी संख्या में शामिल हुए और अपनी रचनाओं व प्रस्तुतियों से सफदर हाशमी को श्रद्धांजलि दी। इस अवसर पर कवि सुरेंद्र सत्यम ने अपनी चर्चित कविता "बेगे की बेगी" का पाठ किया। नूर आलम ने जनवादी गीत प्रस्तुत किया, जबकि जगरूप पेंटर ने पंजाबी गीत सुनाए। सूफी गायक ओम झंडवालिया ने भी अपनी प्रस्तुति दी। 'गीतों व नुक्कड़ नाटकों से लोगों की पीड़ा को दी आवाज' वक्ताओं ने सफदर हाशमी के जीवन और संघर्ष पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि हाशमी ने गीतों और नुक्कड़ नाटकों के जरिए आम जनता की पीड़ा को आवाज दी और सत्ता से सवाल पूछने की परंपरा स्थापित की। वक्ताओं ने जोर दिया कि उन्होंने कला को सामाजिक बदलाव का माध्यम बनाया और आज भी उनकी जनपक्षधर कला की प्रासंगिकता बनी हुई है। जनवादी सांस्कृतिक आंदोलन को आगे बढ़ाने का संकल्प कार्यक्रम के समापन पर सभी कलाकारों ने संकल्प लिया कि वे गीत, कविता और नाट्य के माध्यम से जनवादी सांस्कृतिक आंदोलन को आगे बढ़ाएंगे और सामाजिक बदलाव की लड़ाई को मजबूत करेंगे। इस अवसर पर देव बाबू, राम सिंह थेहड़ी, हरजी वर्मा, युवा लेखक सतनाम सिंह, मेजर सिंह, बसंत सिंह, आत्मा सिंह, अशोक कुमार, कमल प्रभात, टीवी कलाकार गुरतेज सिंह सिद्धू, धर्मपाल बसीर, लक्ष्मण यादव, रामचंद्र धीगड़ा, सदाली खुद्दार और जय किशन सहित कई कलाकार और साहित्यप्रेमी मौजूद थे। कार्यक्रम का संचालन बहादुर सिंह चौहान ने किया।
हनुमानगढ़ में जनवादी लेखक, नाटककार और रंगकर्मी सफदर हाशमी की 46वीं बरसी मनाई गई। टाउन स्थित जनशक्ति भवन में जनवादी लेखक संघ और जन नाट्य मंच ने एक कार्यक्रम का आयोजन किया। इसमें जिले के कवि, लेखक, गायक, रंगकर्मी और सामाजिक कार्यकर्ता बड़ी संख्या में
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इस अवसर पर कवि सुरेंद्र सत्यम ने अपनी चर्चित कविता "बेगे की बेगी" का पाठ किया। नूर आलम ने जनवादी गीत प्रस्तुत किया, जबकि जगरूप पेंटर ने पंजाबी गीत सुनाए। सूफी गायक ओम झंडवालिया ने भी अपनी प्रस्तुति दी।
'गीतों व नुक्कड़ नाटकों से लोगों की पीड़ा को दी आवाज' वक्ताओं ने सफदर हाशमी के जीवन और संघर्ष पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि हाशमी ने गीतों और नुक्कड़ नाटकों के जरिए आम जनता की पीड़ा को आवाज दी और सत्ता से सवाल पूछने की परंपरा स्थापित की। वक्ताओं ने जोर दिया कि उन्होंने कला को सामाजिक बदलाव का माध्यम बनाया और आज भी उनकी जनपक्षधर कला की प्रासंगिकता बनी हुई है।