राजस्थान- सबसे ऊंची चोटी से खोज रहे ब्रह्मांड के रहस्य:अब तक 6 ग्रह ढूंढे, अब एक और ‘पृथ्वी’ की तलाश में जुटे जहां हवा-पानी हो
राजस्थान की सबसे ऊंची चोटी से ब्रह्मांड के रहस्य खोजे जा रहे हैं। अबतक 6 नए ग्रह की खोज हो चुकी है। इनमें एक तो इतना विशाल है कि उसमें 5 पृथ्वियां आसानी से समा जाएं। यहां जुटे वैज्ञानिकों का अगला कदम है 'सुपर-अर्थ' को ढूंढना, जहां पृथ्वी की तरह जल, हवा, जमीन और जीवन हो। ये सब हो रहा है हिल स्टेशन माउंट आबू की चोटी गुरु शिखर पर स्थापित अंतरिक्ष विभाग की फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी (PRL) में। जब दुनिया सो रही होती है, तब यहां से करोड़ों-खरबों किलोमीटर दूर तारों के बनने, टूटने, गैलेक्सी में विस्फोट जैसी खगोलीय घटनाओं पर नजर रखी जाती है। इसके लिए यहां 4 सबसे आधुनिक टेलिस्कोप लगे हैं। खास परमिशन लेने के बाद भास्कर टीम इसी लैब में पहुंची। साइंटिस्टों से बात कर जाना कैसे राजस्थान की सरजमीं पर अंतरिक्ष के अनछुए पहलुओं को खोजा जा रहा है... राजस्थान की सबसे ऊंची चोटी पर खोजे जा रहे ब्रह्मांड के रहस्य अरावली की सबसे ऊंची चोटी गुरु शिखर तक हम आबू रोड़ से पहाड़ियों के रास्ते 18 किमी लंबा सफर तय कर पहुंचे। यहीं पर है सफेद रंग की डोम शेप में बनी बिल्डिंग का नाम है- फिजिकल रिसर्च लेबोरेट्री (PRL)। जो कि स्थानीय रूप से “तारामंडल” के नाम से प्रसिद्ध है । शिखर की चोटी पर अलग-अलग पहाड़ियों के बीच 5 सफेद डोम और कई कंटेनर जैसी प्रयोगशालाएँ बनाई गईं हैं। इनमें कुल 5 दूरबीनें (इंफ्रारेड और ऑप्टिकल तकनीक पर काम करने वाली) और वायुमंडलीय शोध से जुड़े उपकरण लगाए गए हैं। दो छोटे और तीन बड़े। इन टेलिस्कोप का इस्तेमाल अलग-अलग दूरी पर ग्रहों, एक्सोप्लैनेट, तारों, धूमकेतुओं, आकाशगंगाओं तथा अन्य रोचक खगोलीय घटनाओं पर अनुसंधान में किया जाता है। जब हम वेधशाला पहुंचे तो बादल थे। इस कारण टेलिस्कोप काम नहीं कर रहा था। अंदर मौजूद साइंटिस्ट की टीम कुछ समय पहले ली गई तस्वीरों और डेटा का एनालिसिस करने में जुटी थी। यहां हमारी मुलाकात साइट प्रभारी प्रो. सुनील चंद्रा, उनके साथी युवा वैज्ञानिकों तथा छात्रों की टीम से हुई। चंद्रा ने बताया कि यह ऑब्जर्वेशन स्टेशन 1980 के दशक में भारत के अंतरिक्ष विभाग के प्रोजेक्ट के तौर पर स्थापित हुआ था। सबसे ऊंची चोटी पर स्थापित करने की भी खास वजह थी। इतनी ऊंचाई पर आसमान साफ होता है, नमी कम होती है और वातावरण में धूल-कण बेहद सीमित होते हैं। स्थिर वातावरण के कारण टेलीस्कोप (दूरबीन) के जरिए करोड़ों-अरबों मील दूर सौरमंडल में जन्म लेते नए तारे, चमकदार ग्रहों की पहचान और ब्रह्मांड में हो रहे विस्फोट जैसी खगोलीय घटनाओं को बिना रुकावट के हम समझ पाते हैं। बीते 9 साल में 6 नए प्लेनेट की हो चुकी खोज सुनील चंद्रा ने बताया कि इस वेधशाला में 2016 में PARAS उपकरण के उल्लेखनीय विकास के बाद, प्रो. अभिजीत चक्रवर्ती (खगोल विज्ञान एवं खगोल-भौतिकी प्रभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर एवं निवर्तमान प्रमुख) एवं उनकी टीम ने पिछले 9 वर्षों में सटीक “रेडियल वेलोसिटी तकनीक” का उपयोग करते हुए 6 नए एक्सोप्लैनेट की खोज की है। इनमें से सबसे हाल ही में खोजा गया एक्सोप्लैनेट TOI-6038A b है। ये इतना विशाल है कि 5 पृथ्वी आसानी से समा सकती हैं। वेधशाला में 5 टेलिस्कोप हैं। हर किसी का इस्तेमाल अलग-अलग प्रकार की गणनाओं में किया जाता है। लैब में लगी हैं ये पांच दूरबीन- 2.5 मीटर और 1.2 मीटर, दोनों ही टेलीस्कोप पृथ्वी जैसे विशाल ग्रह खोजने की भारत की सबसे तेज और भरोसेमंद खगोलीय टेलीस्कोप में से एक हैं। PARAS-2 पूर्णतः स्वदेशी और 2.5 मीटर टेलिस्कोप भारत और बेल्जियम की कंपनी AMOS के सहयोग से विकसित हुए हैं और इनमें देसी इंजीनियरिंग का बड़ा योगदान है। ‘टेलीस्कोप 1.2 मीटर’ ने ढूंढा सबसे चर्चित धूमकेतु, साइंटिस्ट बोले- एक महीने में हो जाएगा गायब प्रोफेसर सुनील चंद्रा ने बताया कि 2025 में चर्चित धूमकेतु 3I/ATLAS की सटीक गणना 1.2 मीटर टेलीस्कोप से की गई थी। इस धूमकेतु को नासा और दुनिया भर की रिसर्च लैब्स ने सराहा था। इस खोज को कई जगह शोध में शामिल किया था। उन्होंने बताया कि यह धूमकेतु अब भी हमारे सौरमंडल में घूम रहा है। लेकिन धीरे-धीरे इससे बाहर की ओर जा रहा है। फरवरी के पहले सप्ताह तक यानी महीनेभर में यह टेलीस्कोप की नजरों से बिल्कुल ओझल हो जाएगा। वेधशाला की शान है यह 2.5 मीटर आधुनिक दूरबीन लैब की सबसे अहम और मुख्य दूरबीन 2.5 मीटर है। विशाल गुंबद के नीचे इस दूरबीन को 2022 में यानी 3 साल पहले स्थापित किया गया था । इसी दूरबीन ने पिछले साल एक्सोप्लैनेट TOI-6038A b की खोज की थी। यह एक विस्तृत द्वितारा (वाइड बाइनरी) प्रणाली में स्थित घना सब-सैटर्न श्रेणी का दूसरा एक्सोप्लेनेट है, जिसे PARAS-2 ने खोजा है। इससे पूर्व PARAS-2 द्वारा TOI-6651b की खोज की गई थी, जो एक उप-दानव (sub-giant) तारे के चारों ओर परिक्रमा करने वाला घना सब-सैटर्न एक्सोप्लेनेट था। इस खोज ने पूरी दुनिया में अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भारत का लोहा मनवाया था। एक्सोप्लैनेट TOI-6651b इतना बड़ा है कि उसके अंदर पूरी 5 पृथ्वी आराम से समा जाएं। वैज्ञानिक भाषा में यह ‘सब-सैटर्न’ कैटेगरी का ग्रह है, लेकिन आसान शब्दों में कहें तो यह सुदूर अंतरिक्ष में एक ऐसी दुनिया है, जहां हमारी पृथ्वी एक राई के दाने की तरह नजर आएगी। गुरु शिखर पर बनी इस वेधशाला में 1.2-मीटर दूरबीन पर PARAS (Generation-1) का उपयोग करते हुए, इससे पहले एक्सोप्लेनेट TOI-4603b, TOI-1789b, और K2-236b तथा ब्राउन-ड्वार्फ TOI-503 भी खोजे जा चुके हैं। एशिया महाद्वीप में सबसे सटीक स्पेक्ट्रोग्राफ है PARAS-2 पिछले कुछ वर्षों में, 1.2-मीटर दूरबीन के लिए PARAS के विकास से मिले अनुभवों का उपयोग करते हुए, टीम ने 2.5-मीटर दूरबीन के लिए अधिक उन्नत सेकंड जेनेरशन का स्पेक्ट्रोग्राफ PARAS-2 विकसित किया। यह अपनी श्रेणी में एशिया महाद्वीप का सबसे हाई-रिजॉल्यूशन और सबसे सटीक स्पेक्ट्रोग्राफ है। इसी की मदद से 2023 में TOI-6651b सब-सैटर्न श्रेणी का एक्सोप्लेनेट खोजा गया था। यह शनि ग्रह से छोटा है, लेकिन अपनी श्रेणी में सबसे बड़ा है। बीते साल 2.5 मीटर टेलिस्कोप से TOI-6038A b नाम का नया एक्सोप्लैनेट खोजा गया है, जिसमें PARAS-2 की सटीकता की मुख्य भूमिका रही। पारस-2 टेलिस्कोप पर काम कर रही टीम इसकी मदद से ऐसे एक्सोप्लैनेट की तलाश कर रही है जो पृथ्वी की जुड़वां हों। स्पेक्ट्रोग्राफ एक महत्वपूर्ण उपकरण है, जो अंतरिक्ष की किसी भी चीज से आने वाली रोशनी के रंगों को अलग-अलग हिस्सों में बांटकर उसका अध्ययन करता है और इस प्रकार PARAS-2 को अनेक अन्य खगोलीय प्रणालियों के अध्ययन के लिए भी उपयोगी बनाता है। जैसे हम इंद्रधनुष में 7 रंग देखते हैं, वैसे ही तारों, ग्रहों या आकाशगंगाओं की रोशनी का अध्ययन कर यह निर्धारित किया जा सकता है कि वहां किस प्रकार के रासायनिक तत्व उपस्थित हैं। एक-एक गणना में बितानी पड़ती हैं कई रातें डॉ. चंद्रा ने बताया कि स्पेक्ट्रम, ध्रुवण तथा चित्रों के रूप में प्राप्त आंकड़ों को बेहद सावधानीपूर्वक स्टडी किया जाता है, ताकि उपकरणजनित त्रुटियों (आर्टिफैक्ट्स) को हटाया जा सके। इसके बाद उनसे संबंधित खगोलीय जानकारी निकाली जाती है। इसके लिए हम वेधशाला स्थित विश्लेषण केंद्रों के साथ-साथ अहमदाबाद स्थित हमारे मुख्यालय संस्थान की सुविधाओं का भी उपयोग करते हैं। कई बार प्राप्त परिणामों के सिमुलेशन और मॉडलिंग के लिए PRL अहमदाबाद स्थित सुपरकंप्यूटिंग सुविधा ‘VIKRAM-1000’ का भी उपयोग किया जाता है। मेकैनिकल इंजीनियर विवेक मिश्रा ने हमें दूरबीन की विभिन्न प्रणालियों के बारे में जानकारी दी तथा यह भी बताया कि दूरबीनों में लगे दर्पणों की रिफ्लेक्टिविटी की सतत निगरानी किस प्रकार की जाती है। दूरबीन संचालक आसिफ मोहम्मद ने हमें बताया कि प्रत्येक ऑपरेटर पर यह मानसिक दबाव रहता है कि तकनीकी खामियों के कारण वैज्ञानिक अवलोकनों का एक भी उपयोगी क्षण व्यर्थ न जाए। लेपर्ड, भालू, अजगर ही नहीं 'लाइट पॉल्यूशन' से भी जूझते हैं प्रो. सुनील चंद्रा बताते हैं, यहां काम करना आसान नहीं है। जंगली जानवर, भालू, लेपर्ड, अजगर लकड़बग्घों का आए दिन सामना होता है। दिन ढलते ही दरवाजे खिड़कियां बंद कर लेते हैं। जमीन से 5500 फीट की ऊंचाई पर दिसंबर-जनवरी में मौसम बेहद सर्दी होती है। इतनी ऊंचाई पर भी कई बार आसमान साफ नहीं होता तो काम रोकना पड़ता है। रात होने से पहले टाउन तक पहुंचना होता है। रास्ते में अक्सर जानवर सामने आ जाते हैं। मानसून सीजन के 4 महीने लैब बंद रहती है। साल में 220 रात ही इस लैब में रिसर्च हो सकती है। एक बड़ी चुनौती लाइट पॉल्यूशन भी है। शहरों और आसपास के गांवों में रात भर जलने वाली तेज रोशनी से अंतरिक्ष से आने वाले कमजोर इंफ्रा रेड सिग्नल्स में रुकावट होती है। इससे बारीक इंफ्रा-रेड किरणों की सटीक रीडिंग लेना मुश्किल हो जाता है। टेलीस्कोप में लगे सेंसर तक पहुंचने वाला डेटा आस-पास की अनचाही रोशनी से प्रभावित होता है। यही वजह है कि ऑब्जर्वेटरी के लिए अंधेरी, स्थिर और रोशनी-रहित रातें सबसे अधिक जरूरी हैं। 'सुपर अर्थ' की तलाश में जुटे साइंटिस्ट डॉ. सुनील चंद्रा ने बताया कि अब हमारे वैज्ञानिकों का फोकस सब-नेप्च्यून और सुपर-अर्थ (धरती से बड़े लेकिन चट्टानी ग्रह) जैसे कम द्रव्यमान वाले ग्रहों पर है। इसका उद्देश्य ऐसे ग्रह ढूंढना है जो पृथ्वी के द्रव्यमान के करीब हों उनकी सूर्य से उचित दूरी पर हों, ताकि संभावित रहने योग्य हों। इसके अलावा PARAS-2 स्पेक्ट्रोग्राफ की संवेदनशीलता बढ़ाने पर भी काम कर रहे हैं। 2028 तक कुछ दूरबीनों को पूरी तरह रोबोटिक बनाने की भी योजना है, ताकि बिना किसी गलती के सटीक आंकड़े एकत्र किए जा सकें। इसके लिए भविष्य में कुछ कार्यों के लिए AI का भी उपयोग किया जा सकता है। वर्तमान में वेधशाला में स्थानीय अनुसंधान, रखरखाव एवं अवलोकन 1 फैकल्टी सदस्य, 5 अभियंता, 4 अन्य सहायक कर्मचारी तथा 11 दूरबीन संचालक (प्रशिक्षु) कार्यरत हैं | .... भास्कर की ये स्पेशल स्टोरीज भी पढ़िए... 1. बॉलीवुड फिल्म के सेट जैसा राजस्थान का सबसे ऊंचा गांव:5 किलोमीटर सुनसान पहाड़ी रास्ता, भालू-लेपर्ड से भरा जंगल, यहां रहते हैं 40 परिवार 1722 मीटर ऊंचा गुरुशिखर (सिरोही) अरावली पर्वतमाला की सबसे ऊंची चोटी है। यहीं बसा है उतरज गांव। सड़क नहीं होने से न कार जाती है न बाइक। पैदल ही जाना पड़ता है, वो भी उबड़-खाबड़ संकरे रास्तों से होकर। पूरी खबर पढ़िए... 2. राजस्थान में 600 से ज्यादा अजगरों की अनोखी दुनिया:भारत के सबसे बड़े पायथन जोन में भास्कर टीम; कैमरे में कैद साइलेंट शिकारी की मूवमेंट रणथंभौर-सरिस्का के जंगलों में टाइगर की दहाड़ आपने खूब सुनी होगी। जयपुर के झालाना, नाहरगढ़ और पाली के जवाई में शिकार करते तेंदुओं को भी देखा होगा। पूरी खबर पढ़िए...
















