उम्र नहीं होती है बाधा:87 साल के शेरसिंह ने बनाई सीनियर सिटीजन की युवा टोली, खेलों में 17 मेडल जीते
उम्र नहीं होती है बाधा, करने का कुछ हो ठोस इरादा… यह ध्येय वाक्य है 87 साल के शेरसिंह का। जिस उम्र में हड्डियां खटर-पटर करने लग जाती हैं और व्यक्ति बिस्तर में आराम की मुद्रा में आ जाता है, उस आयु में गांव उवार निवासी शेरसिंह खेल के मैदान में फिनिश लाइन को टच करने में उत्साहित रहते हैं। यही कारण है कि पिछले 10 साल में वह 100 मीटर दौड़, गोला फेंक, भाला फेंक, लॉन्ग जंप, हाई जंप आदि में 8 मेडल जीत चुके हैं। और उनकी टीम ने 17 मेडल जीते हैं। इसमें महिलाएं भी हैं, विशेषकर उनकी पत्नी 87 साल की विद्यादेवी और 57 साल की बेटी राजेंद्री। साठ का दशक पार कर चुके इन सीनियर सिटीजन का अब एक ग्रुप है, जो नियमित रूप से खेलता है और बुजुर्गों के लिए आयोजित प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेता है। मसलन, हाल ही में अलवर में आयोजित प्रतियोगिता में 9 मेडल जीते। 87 वर्षीय शेरसिंह यद्यपि बालपन से कुश्ती और खेलों से जुड़े रहे, लेकिन यह शौकिया था। इंडियन स्टाइल की अखाड़ा कुश्तियों में भाग लेते और आयोजनों में शिरकत करते रहे हैं। उम्र चढ़ने के बाद थोड़ा विराम आया, किंतु सुबह-शाम की टहलना और कसरत जारी रही। इसी दौरान वर्ष 2017 में वह अपनी पौत्री शैफाली से मिलने दिल्ली गए थे। पास के स्टेडियम में सीनियर सिटीजन के लिए हाफ मैराथन हो रही थी, जिसे देखने पहुंचे। शेरसिंह बताते हैं कि पौत्री शैफाली ने प्रेरित किया, तो उन्होंने भी अपना नाम लिखवा दिया। दौड़ने का अभ्यास पहले से था ही, इसलिए मेडल जीत गए। यह टर्निंग पॉइंट था। इसके बाद 2018 में पिंकसिटी मैराथन जयपुर में हिस्सा लिया और लॉन्ग जंप में मेडल जीता। इसके बाद नासिक, पुणे और अलवर में मेडल जीते। शेरसिंह कहते हैं, यहां मेडल का ज्यादा महत्व नहीं है, मकसद जीवन के आखिरी पड़ाव में उत्साह और उमंग से जीना है। इसलिए वह पूजा-सेवा तक सीमित रहकर उम्र काट रहे लोगों को खेलों से जुड़ने के लिए प्रेरित करते हैं। कोशिशें रंग ला रही हैं। उनकी टीम में 20 से ज्यादा बुजुर्ग हैं, जो खेलते हैं और अपनी नई पीढ़ी को प्रेरित करते हैं। इनमें दर्याबसिंह, फिल्मीराम, भिक्की सिंह, खजानसिंह, गिर्राजसिंह, हरिओम सरपंच आदि ने भी मैराथन, जेवेलिन थ्रो, लॉन्ग जंप, हाई जंप, डिस्कस थ्रो आदि में मेडल जीते हैं।