संविदा ANM-भर्ती में 18 साल के युवा भी होंगे पात्र:हाईकोर्ट का फैसला- संविदा भर्ती में 21 साल उम्र की शर्त को बताया अवैध
राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्य पीठ ने महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता (ANM) की संविदा भर्ती में न्यूनतम आयु सीमा को लेकर एक क्रांतिकारी फैसला सुनाया है। कोर्ट ने 'राजस्थान सिविल पदों पर संविदा भर्ती नियम-2022' के नियम-6 को आंशिक रूप से असंवैधानिक, मनमाना और अवैध घोषित कर दिया। जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस अनुरूप सिंघी की खंडपीठ ने 52 पेज के विस्तृत फैसले में कहा कि जब नियमित नौकरी के लिए 18 साल की उम्र काफी है, तो संविदा के लिए 21 साल की शर्त समानता के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन है। शोभा सहित 28 याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई इस मामले में मुख्य याचिकाकर्ता जोधपुर के जाटी भांडू निवासी शोभा पुत्री बाबूराम के अलावा, दिव्या चौधरी, सीमा मेघवाल सहित कुल 28 अभ्यर्थियों ने अलग-अलग रिट याचिकाएं दायर की थीं। इन सभी याचिकाओं को भी संयुक्त रूप से सुना गया। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता यशपाल खिलेरी व अन्य ने पैरवी की। एडवोकेट खिलेरी ने याचिकाकर्ताओं की ओर से कोर्ट को बताया कि उन्होंने 12वीं पास कर एएनएम कोर्स पूरा किया और राजस्थान नर्सिंग काउंसिल में रजिस्टर्ड हैं। उनकी उम्र 18 से 20 साल के बीच है, जो नियमित भर्ती के लिए योग्य है, लेकिन संविदा भर्ती के नए नियमों ने उन्हें दौड़ से बाहर कर दिया है। कोर्ट के सामने दो विज्ञापनों का विरोधाभास उजागर हुआ कोर्ट के समक्ष यह तथ्य लाया गया कि चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग ने 19 मई 2023 को एएनएम के पदों पर नियमित नियुक्ति के लिए विज्ञापन जारी किया था। इसमें 'राजस्थान चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधीनस्थ सेवा नियम-1965' के नियम-10 के तहत न्यूनतम आयु 18 वर्ष रखी गई थी। इसके ठीक विपरीत, राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड ने 6 जुलाई 2023 को इन्हीं पदों पर संविदा भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया। इसमें 'संविदा भर्ती नियम-2022' का हवाला देते हुए न्यूनतम आयु 21 वर्ष कर दी गई। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि एक ही पद, समान योग्यता और समान कार्य के लिए नियुक्ति की प्रकृति (नियमित बनाम संविदा) के आधार पर आयु सीमा में अंतर करना अतार्किक और भेदभावपूर्ण है। सरकार का तर्क, संविदा के लिए 'परिपक्वता' जरूरी राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता राजेश पंवार और अन्य वकीलों ने नियम-6 का बचाव किया। उन्होंने दलील दी कि संविदा भर्ती का उद्देश्य विषय विशेषज्ञों और जानकार व्यक्तियों की सेवाएं लेना है, जिसके लिए अधिक आयु और 'परिपक्वता' जरूरी है। सरकार ने कहा कि 2-3 वर्ष का आयु अंतर तर्कसंगत है, क्योंकि इससे कार्यकुशलता सुनिश्चित होती है। हाईकोर्ट की टिप्पणी: परिपक्वता का तर्क 'हास्यास्पद' हाईकोर्ट ने सरकार के 'परिपक्वता' वाले तर्क को सिरे से खारिज कर दिया। खंडपीठ ने अपनी टिप्पणी में कहा कि यह सुझाव देना पूरी तरह से "हास्यास्पद और अस्थिर" है कि संविदा पद के लिए नियमित पद की तुलना में उच्च स्तर की परिपक्वता की आवश्यकता है। कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब नियमित कर्मचारी (जो स्थायी होता है) 18 साल की उम्र में जिम्मेदारी संभाल सकता है, तो संविदा कर्मचारी (जो अस्थायी है) के लिए 21 साल की उम्र क्यों चाहिए? कोर्ट ने कहा कि नियम-6 में निर्धारित 21 वर्ष की आयु सीमा में कोई समझने योग्य अंतर नहीं है। यह वर्गीकरण तर्कसंगत नहीं है और संविधान के अनुच्छेद 14 द्वारा निषिद्ध मनमानेपन की श्रेणी में आता है। साथ ही, भारतीय संविदा अधिनियम-1872 के तहत भी 18 वर्ष का व्यक्ति अनुबंध करने के लिए कानूनी रूप से सक्षम होता है। पृथक्करणीयता का सिद्धांत लागू कोर्ट ने इस मामले में 'पृथक्करणीयता के सिद्धांत' को लागू किया। यानी, पूरे कानून को रद्द करने के बजाय केवल उस हिस्से को हटाया जाए जो असंवैधानिक है। तदनुसार, कोर्ट ने 'राजस्थान संविदा भर्ती नियम-2022' के नियम-6 को केवल उस हद तक रद्द किया है, जहां यह न्यूनतम आयु 21 वर्ष निर्धारित करता है। 1000 अतिरिक्त पदों का पेंच सुनवाई के दौरान 12 जनवरी 2024 को जारी शुद्धिपत्र का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा। सरकार ने इसके जरिए मूल विज्ञापन में 1000 अतिरिक्त पद जोड़ दिए थे, लेकिन आवेदन की विंडो दोबारा नहीं खोली। इससे वे अभ्यर्थी भी वंचित रह गए जो इस दौरान योग्यता पूरी कर चुके थे। याचिकाकर्ताओं ने इसे भी मनमाना बताया था। इन तीन बिंदुओं में जाने फैसले का अंतिम परिणाम कोर्ट ने अपने फैसले में निम्नलिखित निर्देश दिए: इस फैसले से उन हजारों अभ्यर्थियों के लिए नौकरी के दरवाजे खुल गए हैं, जो कोर्स पूरा करने और प्रोफेशनल डिग्री रखने के बावजूद केवल 19 या 20 साल के होने के कारण संविदा भर्ती से बाहर हो गए थे।